##परिचय
आदिवासी और किसान आंदोलनों का अध्ययन आधुनिक भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, विशेष रूप से बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) परीक्षाओं के लिए। यह उपविषय—आदिवासी एवं किसान आंदोलन — संथाल, मुंडा—केवल विद्रोहों की सूची नहीं है; यह औपनिवेशिक शासन की संरचनात्मक हिंसा, स्वदेशी समुदायों की सहनशक्ति, और संगठित प्रतिरोध के जन्म की एक झलक है, जो बाद में राष्ट्रीय आंदोलन में समाहित हो गया। BPSC अभ्यर्थियों के लिए यह क्षेत्र लगातार अंक दिलाने वाला रहा है, जिसमें उपलब्ध पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों (2018–2025) में 10 प्रश्न नेताओं, स्थानों, तिथियों और संगठनात्मक संबंधों को कवर करते हुए आए हैं।
प्रश्न तथ्यात्मक स्मरण (जैसे, "संथाल विद्रोह के नेता कौन थे?" – BPSC 2021, 2022), भौगोलिक ज्ञान (जैसे, "किस क्षेत्र में आदिवासियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया?" – BPSC 2018), और किसान संगठनों की विश्लेषणात्मक समझ (जैसे, "बिहार प्रांतीय किसान सभा किसने बनाई?" – BPSC 2019; "बकाश्त आंदोलन किसके द्वारा आयोजित किया गया था?" – BPSC 2023) का मिश्रण जांचते हैं। आवश्यक गहराई मध्यम लेकिन सटीक है: अभ्यर्थियों को न केवल सिद्धू और कान्हू (संथाल) और बिरसा मुंडा (मुंडा) जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तियों को जानना चाहिए, बल्कि बुद्धू भगत (कोल विद्रोह) जैसे कम-ज्ञात नेताओं और स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में बिहार किसान सभा के संस्थागत इतिहास को भी जानना चाहिए। पाठ्यक्रम में स्पष्ट रूप से "प्राचीन बिहार," "मध्यकालीन भारत," और "आधुनिक भारत" का उल्लेख है, लेकिन यह उपविषय स्वयं औपनिवेशिक काल में दृढ़ता से टिका हुआ है, जिसका पूर्ववर्ती राजस्व प्रणालियों से कभी-कभी संबंध जुड़ता है।
यह अध्याय आपको इस उपविषय में महारत हासिल करने के लिए सब कुछ प्रदान करेगा। हम एक वैचारिक आधार तैयार करने से शुरुआत करेंगे—यह परिभाषित करते हुए कि आदिवासी आंदोलन और किसान आंदोलन में क्या अंतर है, इन विद्रोहों को जन्म देने वाली औपनिवेशिक राजस्व नीतियों को समझते हुए, और बिहार तथा पड़ोसी क्षेत्रों के सामाजिक-आर्थिक संदर्भ का मानचित्रण करते हुए। फिर हम गहराई से संथाल विद्रोह (1855–56), मुंडा विद्रोह (उलगुलान, 1899–1900), कोल विद्रोह (1831–32), और स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में किसान आंदोलनों (बिहार किसान सभा, बकाश्त आंदोलन) में उतरेंगे। प्रत्येक खंड में कारण, नेता, घटनाएँ, दमन और महत्व शामिल होंगे। हम चुआड़ विद्रोह (1798) का भी विश्लेषण करेंगे, जो एक कम-ज्ञात लेकिन परीक्षा में पूछी गई घटना है। पूरे अध्याय में, हम 10 पिछले वर्षों के प्रश्नों (PYQs) को शिक्षण उपकरण के रूप में समाहित करेंगे, न कि अलग सूचियों के रूप में।
इन नोट्स के अंत तक, आप सक्षम होंगे:
- नेतृत्व, मांगों और तरीकों के आधार पर आदिवासी और किसान आंदोलनों के बीच अंतर करने में।
- स्मृति सहायकों (mnemonics) और तुलनात्मक तालिकाओं की मदद से सभी प्रमुख नेताओं, वर्षों और स्थानों को याद करने में।
- औपनिवेशिक भू-राजस्व प्रणालियों (स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी) को समझने में, जो इन विद्रोहों के मूल में थीं।
- 1857 से पहले के आदिवासी विद्रोहों से 1857 के बाद के संगठित किसान आंदोलनों में संक्रमण का विश्लेषण करने में।
- परीक्षित प्रतिमानों के आधार पर भविष्य के प्रश्नों के कोणों का अनुमान लगाने में।
चलिए शुरू करते हैं।
मूल अवधारणाएँ एवं आधार
विशिष्ट आंदोलनों की जांच करने से पहले, मूल अवधारणाओं को समझना आवश्यक है। ये परिभाषाएँ पूरे अध्याय में बार-बार आएंगी। प्रत्येक प्रमुख शब्द त्वरित संदर्भ के लिए एक उद्धरण-बॉक्स में प्रस्तुत किया गया है।
आदिवासी आंदोलन: स्वदेशी समुदायों (आदिवासियों) की बाहरी शक्तियों—आमतौर पर औपनिवेशिक राज्य, महाजनों और जमींदारों—के विरुद्ध सामूहिक कार्रवाई, जो उनकी भूमि, वन अधिकारों, सांस्कृतिक स्वायत्तता और पारंपरिक शासन को खतरे में डालते हैं। आदिवासी आंदोलनों में अक्सर सशस्त्र विद्रोह शामिल होता है और ये जातीय पहचान और क्षेत्रीयता की भावना में निहित होते हैं। उदाहरण: संथाल, मुंडा, कोल।
किसान आंदोलन: कृषि करने वालों (काश्तकारों, छोटे भूस्वामियों, भूमिहीन मजदूरों) का दमनकारी राजस्व मांगों, ऊँचे किराए, अवैध उगाहियों और ऋण बंधन के विरुद्ध जुटान। किसान आंदोलनों का नेतृत्व शिक्षित मध्यस्थों या स्थानीय नेताओं द्वारा किया जा सकता है और अक्सर ये कानूनी सुधार, किराया कमी, या भूमि अधिकारों की मांग करते हैं। उदाहरण: बिहार किसान सभा, बकाश्त आंदोलन।
औपनिवेशिक भू-राजस्व प्रणाली: ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और बाद में क्राउन द्वारा लगाई गई कराधान की रूपरेखा, जिसने भूमि स्वामित्व, काश्तकारी और कृषि संबंधों को मूलतः बदल दिया। तीन मुख्य प्रणालियाँ थीं स्थायी बंदोबस्त (1793, बंगाल, बिहार, ओडिशा), रैयतवाड़ी (काश्तकारों के साथ प्रत्यक्ष बंदोबस्त, मुख्यतः मद्रास और बॉम्बे प्रेसीडेंसी में), और महालवाड़ी (गाँव-स्तरीय बंदोबस्त, मुख्यतः उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में)। इन प्रणालियों ने जमींदारों, महाजनों और मध्यस्थों के नए वर्ग बनाए, अक्सर आदिवासी और किसान समुदायों की कीमत पर।
स्थायी बंदोबस्त (1793): लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा बंगाल, बिहार और ओडिशा में लागू किया गया। इसने भू-राजस्व को स्थायी रूप से निर्धारित कर दिया, जिससे जमींदार भूमि के पूर्ण स्वामी बन गए। इससे एक परजीवी भूस्वामी वर्ग का उदय हुआ, जबकि किसान इच्छानुसार बेदखल किए जा सकने वाले काश्तकारों (tenants-at-will) में सिमट गए, जो मनमाने किराया-वृद्धि (rack-renting) और बेदखली के अधीन थे। आदिवासी क्षेत्रों को अक्सर सामुदायिक भूमि-धारण प्रतिमानों की परवाह किए बिना इस प्रणाली के अंतर्गत लाया गया।
रैयतवाड़ी प्रणाली: सरकार और व्यक्तिगत काश्तकार (रैयत) के बीच सीधा बंदोबस्त। राजस्व वास्तविक खेती किए गए क्षेत्र के आधार पर निर्धारित किया जाता था और समय-समय पर संशोधित किया जाता था। मध्यस्थों को समाप्त करने के इरादे से होने के बावजूद, यह अक्सर उच्च आकलन और काश्तकारों को कर्ज में डाल देता था। इस प्रणाली ने मध्य भारत के आदिवासी क्षेत्रों को प्रभावित किया।
महालवाड़ी प्रणाली: राजस्व पूरे गाँव समुदाय (महाल) के साथ तय किया जाता था, जिसमें मुखिया या ग्राम निकाय संग्रह के लिए जिम्मेदार होता था। इसने कुछ सामुदायिक संरचनाओं को संरक्षित रखा लेकिन फिर भी भारी बोझ डाला।
बकाश्त भूमि: बिहार में, बकाश्त उस भूमि को संदर्भित करता था जिसे जमींदार या उसके काश्तकार किसी विशेष व्यवस्था के तहत सीधे खेती करते थे, जिसमें अक्सर ऊँचा किराया और असुरक्षित काश्तकारी शामिल होती थी। बकाश्त आंदोलन (1937–38) ऐसी भूमि पर अधिकार सुरक्षित करने के लिए काश्तकारों का संघर्ष था, जिसका नेतृत्व स्वामी सहजानंद सरस्वती ने किया।
उलगुलान (महा-कोलाहल): बिरसा मुंडा के नेतृत्व में मुंडा विद्रोह (1899–1900) को दिया गया नाम। यह एक सहस्राब्दिवादी (millenarian) आंदोलन था जिसने धार्मिक पुनरुत्थान को अंग्रेजों, ईसाई मिशनरियों और दिकुओं (बाहरी लोगों) के विरुद्ध सशस्त्र प्रतिरोध के साथ जोड़ा। "उलगुलान" शब्द अब मुंडा संघर्ष का पर्याय बन गया है।
दिकु: छोटानागपुर क्षेत्र में आदिवासी समुदायों द्वारा बाहरी लोगों—महाजनों, व्यापारियों, जमींदारों और ब्रिटिश अधिकारियों—को संदर्भित करने के लिए प्रयुक्त शब्द, जिन्होंने उनका शोषण किया। संथाल और मुंडा दोनों विद्रोहों ने दिकुओं को निशाना बनाया।
किसान सभा: एक किसान संगठन। बिहार प्रांतीय किसान सभा (BPKS) की स्थापना 1929 में स्वामी सहजानंद सरस्वती ने की थी। यह बिहार में किसान शिकायतों के लिए प्रमुख मंच बन गया, जिसने जमींदारी उत्पीड़न, ऊँचे किराए और बकाश्त प्रणाली के विरुद्ध आंदोलन आयोजित किए। यह बाद में अखिल भारतीय किसान सभा में विलीन हो गई।
निर्बल सेवक: स्वामी सहजानंद सरस्वती द्वारा 1929 में किसानों की कठिनाइयों को उजागर करने के लिए शुरू किया गया एक हिंदी समाचार पत्र। यह जुटान का एक शक्तिशाली उपकरण था और इसे BPSC 2024 में पूछा गया है।
अब समझते हैं कि ये आंदोलन क्यों हुए। ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन ने अपनी राजस्व नीतियों के माध्यम से आदिवासी समुदायों की पारंपरिक भूमि-धारण और वन-उपयोग प्रणालियों को व्यवस्थित रूप से नष्ट कर दिया। संथाल परगना में, स्थायी बंदोबस्त ने गैर-आदिवासी जमींदारों का एक वर्ग बनाया जिसने भारी किराया थोपा और भूमि हड़प ली। छोटानागपुर क्षेत्र (मुंडा और कोल क्षेत्र) में, अंग्रेजों ने खूँटकट्टी प्रणाली (सामुदायिक भूमि-धारण का एक रूप) पेश की लेकिन फिर व्यक्तिगत जमींदारों को मान्यता देकर और महाजनों को बंधक के माध्यम से आदिवासी भूमि प्राप्त करने की अनुमति देकर इसे कमजोर कर दिया। वन कानूनों ने स्थानांतरी खेती और वन उपज तक पहुँच को प्रतिबंधित कर दिया। ईसाई मिशनरियों ने, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा प्रदान करते हुए भी, आदिवासी सामाजिक संरचनाओं और धार्मिक प्रथाओं को बाधित किया। इन दबावों—आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक—ने सशस्त्र विद्रोहों का रूप ले लिया।
दूसरी ओर, किसान आंदोलन जमींदारी प्रणाली के ही अंतर्विरोधों से उभरे। बिहार में, स्थायी बंदोबस्त ने एक शक्तिशाली भूस्वामी वर्ग बनाया था जो अत्यधिक किराया वसूलता था, अवैध उगाहियाँ (अबवाब) लगाता था, और मनमाने ढंग से काश्तकारों को बेदखल करता था। 1930 के दशक की महामंदी ने संकट को और गहरा कर दिया, जिससे व्यापक कर्जदारी और भूमि अलगाव हुआ। सहजानंद के नेतृत्व में बिहार किसान सभा ने इस आक्रोश को संगठित विरोधों, हड़तालों और कानूनी लड़ाइयों में बदल दिया।
इस आधार के साथ, अब हम उन विशिष्ट आंदोलनों की ओर मुड़ते हैं जो परीक्षित हुए हैं और जो व्यापक समझ के लिए आवश्यक हैं।
संथाल विद्रोह (1855–56) – बिहार में पहला बड़ा आदिवासी विद्रोह
पृष्ठभूमि एवं कारण
संथाल भारत के सबसे बड़े आदिवासी समुदायों में से एक हैं, जो वर्तमान झारखंड (पूर्व में बिहार का हिस्सा) के संथाल परगना क्षेत्र में केंद्रित हैं। अंग्रेजों से पहले, वे सापेक्ष स्वायत्तता में रहते थे, स्थानांतरी खेती करते थे और वन तथा भूमि के सामुदायिक स्वामित्व का आनंद लेते थे। 1793 में स्थायी बंदोबस्त की शुरुआत ने इस क्षेत्र को गैर-आदिवासी जमींदारों, महाजनों (महाजन) और व्यापारियों के नियंत्रण में ला दिया। इन बाहरी लोगों—जिन्हें सामूहिक रूप से दिकु कहा जाता था—ने संथालों का इस प्रकार शोषण किया:
- भूमि अलगाव: जमींदारों ने उस भूमि पर स्वामित्व का दावा किया जिसे संथाल परंपरागत रूप से जोतते थे। संथालों को काश्तकार बना दिया गया और उन्हें ऊँचा किराया चुकाने के लिए मजबूर किया गया।
- ऋण बंधन: महाजन अत्यधिक ब्याज दरें (अक्सर प्रति वर्ष 50–100%) वसूलते थे और कर्ज न चुकाने पर भूमि हड़प लेते थे।
- बेगारी (begar): संथालों को बिना मजदूरी के जमींदारों के लिए काम करने के लिए मजबूर किया जाता था।
- न्यायिक उत्पीड़न: ब्रिटिश अदालतें महाजनों और जमींदारों का पक्ष लेती थीं, क्योंकि वे साक्षर थे और कानूनी ज्ञान रखते थे। संथाल मामले हार जाते थे और जेल में डाल दिए जाते थे।
- वन प्रतिबंध: अंग्रेजों ने वन कानून लगाए जिसने संथालों की लकड़ी, ईंधन और चारागाह तक पहुँच को प्रतिबंधित कर दिया।
तात्कालिक ट्रिगर स्थानीय जमींदार और ब्रिटिश प्रशासन द्वारा किए गए उत्पीड़नकारी कृत्यों की एक श्रृंखला थी। 1854 में, क्षेत्र में एक गंभीर अकाल पड़ा, जिसने दुख को और बढ़ा दिया। संथालों ने एक समन्वित विद्रोह में उठने का फैसला किया।
नेता: सिद्धू और कान्हू मुर्मू
विद्रोह का नेतृत्व चार भाइयों—सिद्धू, कान्हू, चांद, और भैरव मुर्मू—ने किया, जिनमें सिद्धू और कान्हू प्रमुख नेता थे। वे मुर्मू वंश से थे और समुदाय में सम्मानित थे। कहा जाता है कि सिद्धू को विद्रोह का नेतृत्व करने के लिए दैवीय आह्वान प्राप्त हुआ था। उन्होंने पारंपरिक संचार विधियों (ढोल, शंख और संदेशवाहकों) का उपयोग करते हुए क्षेत्र भर के हजारों संथालों को संगठित किया। इन नेताओं को BPSC 2021 और 2022 में पूछा गया, जहाँ सही उत्तर "सिद्धू और कान्हू" था। भ्रामक विकल्पों में गौरक्षनी भगत और केशव चंद्र रॉय (बिरसा मुंडा आंदोलन या बाद के किसान नेताओं से संबद्ध) और शंभूनाथ पाल और कोर्रा मल्लैया (असंबद्ध) शामिल थे। इस प्रश्न का बार-बार आना इन सटीक नामों को याद रखने के महत्व को रेखांकित करता है।
विद्रोह का क्रम
- 30 जून 1855: सिद्धू और कान्हू ने भोगनाडीह (वर्तमान साहेबगंज, झारखंड के निकट) में लगभग 10,000 संथालों को एकत्र किया। उन्होंने अंग्रेजों और दिकुओं के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की।
- जुलाई 1855: संथालों ने पुलिस थानों, जमींदार घरों और महाजन प्रतिष्ठानों पर हमला किया। उन्होंने उत्पीड़न के प्रतीकों को निशाना बनाया, रिकॉर्ड जलाए और बड़े क्षेत्रों पर नियंत्रण प्राप्त किया।
- ब्रिटिश प्रतिक्रिया: ईस्ट इंडिया कंपनी ने कलकत्ता, दिनाजपुर और भागलपुर से सेनाएँ भेजीं। संथालों ने धनुष, बाण और कुल्हाड़ियों से बंदूकों और तोपों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। अपनी बहादुरी के बावजूद, वे अनुशासित ब्रिटिश सेना का मुकाबला नहीं कर सके।
- मुख्य युद्ध: संथालों ने बरहेट और लिटीपाड़ा में प्रारंभिक विजय प्राप्त की, लेकिन साहिबगंज और राजमहल में पराजित हो गए। अंग्रेजों ने गाँवों को जलाकर और खाद्य आपूर्ति को नष्ट करके धरती-जलाओ (scorched-earth) रणनीति अपनाई।
- पकड़ और मृत्यु: सिद्धू अगस्त 1855 में युद्ध में मारे गए। कान्हू को पकड़ा गया और 1856 में फाँसी दे दी गई। विद्रोह 1856 की शुरुआत तक कुचल दिया गया।
दमन एवं परिणाम
ब्रिटिश प्रतिक्रिया क्रूर थी। हजारों संथाल मारे गए, और कई को दंड-उपनिवेशों में निर्वासित कर दिया गया। क्षेत्र को सैन्य नियंत्रण में रखा गया। हालांकि, विद्रोह ने अंग्रेजों को संथालों की विशिष्ट पहचान को मान्यता देने के लिए मजबूर किया। 1856 में, संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम पारित किया गया, जिसने आदिवासी भूमि के गैर-आदिवासियों को हस्तांतरण को प्रतिबंधित किया। यह एक महत्वपूर्ण रियायत थी, हालांकि इसे पूरी तरह से लागू नहीं किया गया।
महत्व
- संथाल विद्रोह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध पहले बड़े आदिवासी विद्रोहों में से एक था, जो 1857 के विद्रोह से पहले हुआ।
- इसने आदिवासी समुदायों की बड़े पैमाने पर प्रतिरोध संगठित करने की क्षमता प्रदर्शित की।
- इसने संथाल परगना को एक अलग प्रशासनिक इकाई के रूप में स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त किया, जिसमें आदिवासी भूमि के लिए विशेष सुरक्षा थी।
- विद्रोह ने बाद के आंदोलनों, जिसमें मुंडा विद्रोह भी शामिल है, को प्रेरित किया।