राज्य-रियासतें, विलय और राज्य आंदोलन (2000 में छत्तीसगढ़ का गठन)
परिचय
छत्तीसगढ़ का 1 नवम्बर 2000 को भारत के छब्बीसवें राज्य के रूप में अस्तित्व में आना स्वतंत्रता-पश्चात भारतीय राजनीतिक इतिहास के सबसे प्रभावशाली अध्यायों में से एक है। यह कहानी दर्जनों छोटी रियासतों के भाग्य, भारतीय संघ के एकीकरण की प्रक्रिया, दशकों के जमीनी आंदोलन और अंततः उस क्षेत्रीय पहचान की विजय को एक सूत्र में पिरोती है जो विशाल मध्य प्रदेश के प्रशासनिक छत्र के नीचे लंबे समय तक दबी हुई थी। सीजीपीएससी के अभ्यर्थियों के लिए यह उप-विषय केवल एक ऐतिहासिक जिज्ञासा नहीं है — यह उस राज्य के संवैधानिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक आधारों का सीधा द्वार है, जिसकी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी आप कर रहे हैं।
यह उप-विषय सीजीपीएससी परीक्षा में कम से कम दो अवसरों पर पूछा जा चुका है, जो पिछले वर्षों के प्रश्न-पत्रों में दर्ज है — 2019 और 2020 में — और इन प्रश्नों की प्रकृति एक महत्वपूर्ण परीक्षा पैटर्न को उजागर करती है। 2019 के प्रश्न में उस सटीक कानूनी साधन का ज्ञान परखा गया जिसके माध्यम से छत्तीसगढ़ के क्षेत्रों को अलग किया गया, विशेष रूप से मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000। 2020 के प्रश्न में एक विशिष्ट रियासती शासक, प्रफुल्ल कुमारी देवी (कवर्धा/कबीरधाम) के बारे में ज्ञान परखा गया, जो छत्तीसगढ़ की एक रियासत की उल्लेखनीय महिला शासक थीं। दोनों प्रश्न उस स्तर की सटीकता की मांग करते हैं जो व्यापक सामान्यीकरण से परे जाती है — आपको सही अधिनियम, सही नाम, सही तिथियाँ और घटनाओं का सही क्रम जानना होगा।
यह उप-विषय तीन प्रमुख ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के प्रतिच्छेदन पर स्थित है। पहली, स्वयं रियासतों की कहानी — ब्रिटिश-प्रशासित छत्तीसगढ़ के भीतर और उसके समीप विद्यमान सामंतशाही राज्य, मराठा आधिपत्य में उनकी उत्पत्ति, उनका आंतरिक शासन और उनका वंशवादी इतिहास। दूसरी, एकीकरण और विलय की कहानी — वह प्रक्रिया जिसके द्वारा इन रियासतों को स्वतंत्र भारत में और अंततः मध्य प्रदेश में शामिल किया गया, एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें कूटनीति, बातचीत, कानूनी साधन और कभी-कभी दबाव भी शामिल था। तीसरी, राज्य आंदोलन की कहानी — छत्तीसगढ़ क्षेत्र के लोगों द्वारा एक अलग राज्य प्राप्त करने के लिए लंबा, कभी हिंसक तो कभी शांतिपूर्ण आंदोलन, जो उनकी विशिष्ट पहचान, उनके आर्थिक अविकास और उनके राजनीतिक हाशिएकरण को संबोधित करता हो।
इन तीन सूत्रों और उनके अंतर्संबंध को समझना न केवल इस उप-विषय के बारे में सीधे प्रश्नों का उत्तर देने के लिए आवश्यक है, बल्कि छत्तीसगढ़ के भूगोल, अर्थव्यवस्था, जनजातीय समुदायों और शासन के बारे में प्रश्नों को प्रासंगिक बनाने के लिए भी आवश्यक है — ये सब अपने वर्तमान स्वरूप का पता उन नींव के दशकों के दौरान लिए गए निर्णयों से लगाते हैं। छत्तीसगढ़ का गठन राज्य के आधुनिक प्रशासनिक मानचित्र का मूल बिंदु है, और इसे अच्छी तरह जानने का अर्थ है स्वयं राज्य को जानना।
मूल अवधारणाएँ और आधार
विस्तृत विवरण में जाने से पहले, उस अवधारणात्मक शब्दावली को स्थापित करना महत्वपूर्ण है जो इस अध्याय में बार-बार आएगी।
रियासत (Princely State): ब्रिटिश भारत में एक राजनीतिक इकाई जो सीधे ब्रिटिश क्राउन द्वारा प्रशासित नहीं थी, बल्कि एक भारतीय शासक (जिसे विभिन्न उपाधियों जैसे राजा, महाराजा, नवाब, निज़ाम आदि से जाना जाता था) द्वारा प्रभुत्व (paramountcy) की प्रणाली के तहत शासित होती थी — जिसका अर्थ था कि ब्रिटिश क्राउन के पास अंतिम प्रभुत्व था जबकि देशी शासक आंतरिक प्रशासन का प्रबंधन करता था।
प्रभुत्व (Paramountcy): वह सिद्धांत जिसके तहत ब्रिटिश क्राउन ने सभी रियासतों पर सर्वोच्च अधिकार का दावा किया। यह संबंध व्यक्तिगत राज्यों और ब्रिटिश भारत सरकार के बीच संधियों, सनदों (औपचारिक अनुदानों) और राजनीतिक व्यवस्थाओं में निहित था। जब ब्रिटिश भारत स्वतंत्र हुआ तो प्रभुत्व समाप्त हो गया, जिससे प्रत्येक रियासत तकनीकी रूप से भारत, पाकिस्तान में शामिल होने या स्वतंत्र रहने के लिए स्वतंत्र हो गई।
विलय (Accession): स्वतंत्रता के बाद एक रियासत द्वारा भारत (या पाकिस्तान) के अधिराज्य में शामिल होने का औपचारिक कार्य। विलय विलय-पत्र (Instrument of Accession) द्वारा शासित था, एक कानूनी दस्तावेज़ जिसके तहत शासक ने रक्षा, विदेशी मामलों और संचार पर संप्रभु अधिकार अधिराज्य सरकार को सौंप दिया, जबकि आंतरिक मामलों पर नियंत्रण बनाए रखा।
विलय-पत्र (Instrument of Accession): भारत सरकार द्वारा भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के तहत तैयार किया गया एक मानकीकृत कानूनी दस्तावेज़, जिस पर प्रत्येक रियासती शासक ने अपने राज्य की संप्रभुता को औपचारिक रूप से भारतीय अधिराज्य में विलय करने के लिए हस्ताक्षर किए। यह पूर्ण विलय नहीं था बल्कि हस्तांतरित किए जा रहे विशिष्ट विषयों (रक्षा, विदेशी मामले, संचार) के बारे में एक समझौता था।
विलय समझौता (Merger Agreement): विलय-पत्र के बाद हस्ताक्षरित एक बाद का और अधिक व्यापक दस्तावेज़, जिसके द्वारा एक शासक अपने राज्य को पूरी तरह से किसी पड़ोसी प्रांत में एकीकृत करने या केंद्र-प्रशासित क्षेत्र का हिस्सा बनाने पर सहमत हुआ। विलय के तहत, शासक ने सभी संप्रभु अधिकार छोड़ दिए और उसे प्रिवी पर्स (privy purse) (भारत सरकार से वार्षिक भुगतान) और व्यक्तिगत विशेषाधिकार प्रदान किए गए।
प्रिवी पर्स (Privy Purse): रियासतों के पूर्व शासकों को उनके क्षेत्रों को भारतीय संघ में विलय करने के बदले में गारंटीकृत कर-मुक्त वार्षिक भुगतान। प्रिवी पर्स को 26वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1971 द्वारा इंदिरा गांधी सरकार के तहत राष्ट्रपति शासन के बाद समाप्त कर दिया गया था।
राज्य आंदोलन (Statehood Movement/Prithak Rajya Andolan): मध्य प्रदेश के पूर्वी जिलों से छत्तीसगढ़ का एक अलग राज्य बनाने की मांग करने वाला संगठित राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन। यह आंदोलन क्षेत्रीय पहचान, भाषाई विशिष्टता (छत्तीसगढ़ी बोली), आर्थिक अविकास, जनजातीय कल्याण और प्रशासनिक उपेक्षा के तर्कों पर आधारित था।
मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 (Madhya Pradesh Reorganisation Act, 2000): केंद्रीय विधान (संसद द्वारा अधिनियमित) जिसने औपचारिक रूप से मध्य प्रदेश राज्य को दो राज्यों में विभाजित किया — शेष मध्य प्रदेश और नया राज्य छत्तीसगढ़ — जो 1 नवम्बर 2000 से प्रभावी हुआ। यह अधिनियम (सीधे CGPSC 2019 में परखा गया) एक राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ का कानूनी जन्म प्रमाण पत्र है।
राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 (States Reorganisation Act, 1956): एक ऐतिहासिक संसदीय अधिनियम जिसने मुख्य रूप से भाषाई आधार पर भारत के राज्यों का पुनर्गठन किया, राज्यों के पहले के भाग A, भाग B, भाग C और भाग D वर्गीकरण को समाप्त कर दिया। इस अधिनियम ने 1956 में पुराने मध्य प्रदेश, मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल राज्य सहित कई इकाइयों को मिलाकर विस्तृत मध्य प्रदेश का निर्माण किया। छत्तीसगढ़ एक विशिष्ट प्रशासनिक क्षेत्र के रूप में 1956 से 2000 तक इस बड़े मध्य प्रदेश के भीतर अस्तित्व में था।
छत्तीसगढ़ संभाग (Chhattisgarh Sambhag/Division): मध्य प्रदेश के भीतर प्रशासनिक प्रभाग जिसने ऐतिहासिक छत्तीसगढ़ क्षेत्र के अनुरूप पूर्वी जिलों को एक साथ समूहित किया। इस प्रभाग का मूल — रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, राजनांदगाँव, बस्तर, सरगुजा और उनके उप-जिले — अंततः नए राज्य का केंद्र बन गए।
औपनिवेशिक छत्तीसगढ़ में सामंतशाही संरचना
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और बाद में ब्रिटिश क्राउन के तहत, छत्तीसगढ़ क्षेत्र को दो व्यापक श्रेणियों के माध्यम से प्रशासित किया जाता था: सीधे प्रशासित ब्रिटिश जिले (केंद्रीय प्रांतों के प्रशासन के तहत) और सामंतशाही राज्यों का एक नेटवर्क (कुछ संदर्भों में ज़मींदारी भी कहा जाता है, हालांकि बड़े राज्यों को उनके अपने शासकों के साथ रियासतों के रूप में मान्यता दी गई थी)। अंग्रेजों ने इन सामंतशाही राज्यों को आकार, राजस्व और उनके शासकों को मिलने वाली सलामी के आधार पर पदानुक्रमित रूप से वर्गीकृत किया।
छत्तीसगढ़ की सामंतशाही रियासतें केंद्रीय प्रांतों और बरार प्रशासन के भीतर छत्तीसगढ़ राज्य शीर्षक के तहत समूहित की गईं। प्रमुख राज्यों में बस्तर, कांकेर, सरगुजा, कोरिया (Koriya), रायगढ़, जशपुर, सारंगढ़, सक्ती, कवर्धा, खैरागढ़, नंदगाँव, छुईखदान, फुलझर (महासमुंद), बिंद्रा-नवागढ़, सूरजपुर, उदयपुर (सरगुजा उप-प्रभाग), अंबागढ़ चौकी और अन्य शामिल थे। कुल मिलाकर, छत्तीसगढ़ क्षेत्र में लगभग चौदह से अठारह मान्यता प्राप्त सामंतशाही राज्य थे (सटीक संख्या लागू पदानुक्रमित मान्यता के स्तर के आधार पर भिन्न होती है)।
ये राज्य आकार में बहुत भिन्न थे। बस्तर अब तक सबसे बड़ा था — लगभग एक छोटे यूरोपीय देश के आकार का — जबकि छुईखदान या अंबागढ़ चौकी जैसे राज्य न्यूनतम राजस्व वाली छोटी भू-जोत थे। इस विषमता ने बाद में विलय प्रक्रिया को जटिल बना दिया।
अंग्रेजों और सामंतशाही राज्यों के बीच संबंध राजनीतिक एजेंट या अधीक्षक के कार्यालय के माध्यम से संचालित होते थे, जो रायपुर में तैनात था और छत्तीसगढ़ राज्यों पर ब्रिटिश अधिकार के प्रमुख प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता था। गवर्नर-जनरल के एजेंट ने उत्तराधिकार विवादों, अंतर-राज्य क्षेत्राधिकार से जुड़े आपराधिक मामलों और नई संधियों या व्यापार व्यवस्थाओं के अनुमोदन जैसे मामलों पर पर्यवेक्षी अधिकार क्षेत्र का प्रयोग किया। जब एक सामंतशाही शासक और उसकी प्रजा के बीच विवाद उत्पन्न होते थे — जैसा कि बस्तर में भुमकाल विद्रोह के दौरान नाटकीय रूप से हुआ — ब्रिटिश राजनीतिक अधिकारी के पास हस्तक्षेप करने और यदि आवश्यक हो, प्रत्यक्ष प्रशासन लागू करने का अधिकार था।
अप्रत्यक्ष शासन की इस प्रणाली के स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर छत्तीसगढ़ राज्यों के प्रशासनिक चरित्र के लिए महत्वपूर्ण परिणाम थे। इनमें से कई राज्यों ने आधुनिक प्रशासनिक तंत्र विकसित नहीं किया था — कोई निर्वाचित परिषद नहीं, ब्रिटिश लाइनों पर कोई भू-राजस्व बंदोबस्त नहीं, कोई संहिताबद्ध आपराधिक प्रक्रिया नहीं। इसलिए, 1948 में विलय के बाद सामंतशाही प्रशासन से जिला-स्तरीय नौकरशाही प्रणाली में परिवर्तन उनकी आबादी के लिए एक गहरा परिवर्तन था, न कि केवल शीर्ष पर लेटरहेड का परिवर्तन।
छत्तीसगढ़ की रियासतें: राजवंश, शासक और प्रशासन
उत्पत्ति और वंशावलीय वंश
छत्तीसगढ़ की रियासतें किसी एक राजनीतिक घटना से उत्पन्न नहीं हुईं। उनकी उत्पत्ति हैहय कलचुरी वंश (जिसने मध्ययुगीन काल में छत्तीसगढ़ के पठार के अधिकांश भाग को नियंत्रित किया था) के पतन, उसके बाद स्थानीय सरदारों के उदय और अठारहवीं शताब्दी में मराठा आधिपत्य के थोपे जाने के बाद हुए विखंडन में निहित है।
जब 1741 के बाद रघोजी भोंसले प्रथम के तहत नागपुर के भोंसले कबीले ने छत्तीसगढ़ पर अपनी शक्ति का विस्तार किया, तो उन्हें छोटे राज्यों और सरदारियों का एक मोज़ेक मिला। मराठों ने इन्हें एक कर-भुगतान प्रणाली में संगठित किया, क्षेत्र की देखरेख के लिए रायपुर में एक सूबा (गवर्नर) नियुक्त किया। जो सामंतशाही प्रमुख मराठा प्रभुत्व स्वीकार करते थे और कर चुकाते थे, उन्हें अपने क्षेत्रों पर शासन करने के लिए काफी हद तक छोड़ दिया गया, जिससे वह टेम्पलेट तैयार हुआ जिसे अंग्रेजों ने बाद में औपचारिक रूप दिया।
जब अंग्रेजों ने मराठों से छत्तीसगढ़ ले लिया (तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध और 1818 की परिणामी संधियों के बाद), तो उन्होंने सामंतशाही संरचना को पहले से मौजूद पाया। अधीनस्थ गठबंधन की ब्रिटिश नीति (जिसने सिद्धांत रूप में प्रभुत्व को बदल दिया था लेकिन व्यवहार में इसे बनाए रखा) का अर्थ था कि मौजूदा सामंतशाही शासकों को मान्यता दी गई, उनके वंशों की पुष्टि की गई, और उनके क्षेत्रों को व्यक्तिगत राजनीतिक व्यवस्थाओं के माध्यम से ब्रिटिश प्रशासनिक ढांचे में एकीकृत किया गया।
कवर्धा और कवर्धा शाही परिवार
CGPSC 2020 में प्रफुल्ल कुमारी देवी के बारे में परखा गया प्रश्न कवर्धा राज्य और उसके शासक वंश के विस्तृत ज्ञान की मांग करता है। कवर्धा (आधुनिक कबीरधाम जिला) उत्तर-मध्य छत्तीसगढ़ में एक छोटा लेकिन सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण सामंतशाही राज्य था।
कवर्धा का शासक परिवार राज गोंड वंश से संबंधित था, हालांकि सदियों से उन्होंने राजपूत रीति-रिवाजों और उपाधियों को अपना लिया था। राजस्व के मामले में राज्य का प्रशासनिक और राजनीतिक महत्व मामूली था, लेकिन राजवंश ने कई उल्लेखनीय व्यक्तित्व पैदा किए।
प्रफुल्ल कुमारी देवी (कुछ स्रोतों में प्रफुल कुमारी देवी भी लिखा जाता है) कवर्धा की एक महिला शासक थीं, जिन्होंने 1916 में बारह वर्ष की आयु में सिंहासन पर आरूढ़ हुईं। जैसा कि CGPSC 2020 के प्रश्न से पुष्टि होती है, उनके बारे में तीनों कथन — कि वह छत्तीसगढ़ की दूसरी महिला शासक थीं, कि उन्होंने 1916 में सिंहासन ग्रहण किया, और कि वह उस समय बारह वर्ष की थीं — तथ्यात्मक रूप से सत्य हैं। उनका महत्व इस उल्लेखनीय तथ्य में निहित है कि एक नाबालिग लड़की एक सामंतशाही राज्य की शासन प्रमुख बनी — एक ऐसा पद जिसके लिए ब्रिटिश राजनीतिक अधिकारियों से मान्यता की आवश्यकता थी। उनका शासन काल अंतर-युद्ध काल के अधिकांश समय तक चला, जिससे वह कवर्धा की सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाली शासकों में से एक बन गईं।
प्रफुल्ल कुमारी देवी को छत्तीसगढ़ की दूसरी महिला शासक के रूप में नामित करने का तात्पर्य पहली महिला शासक के अस्तित्व से है — यह तथ्य परीक्षा के उद्देश्यों के लिए ध्यान देने योग्य है। जबकि इस पहली महिला शासक की पहचान मानक CGPSC तैयारी सामग्री में व्यापक रूप से दर्ज नहीं है, 2020 के प्रश्न का ढाँचा क्षेत्र में कम से कम एक पूर्ववर्ती महिला शासक की ऐतिहासिकता की पुष्टि करता है।
बस्तर: सबसे बड़ी रियासत
छत्तीसगढ़ की रियासतों का कोई भी विवरण बस्तर राज्य पर विस्तार से ध्यान दिए बिना पूरा नहीं होता, जो क्षेत्र का अब तक का सबसे महत्वपूर्ण सामंतशाही क्षेत्र था। बस्तर के शासक वंश ने कल्याणी के चालुक्यों से अपना वंश होने का दावा किया और मध्ययुगीन काल से क्षेत्र पर शासन किया। राज्य में छत्तीसगढ़ का संपूर्ण दक्षिणी पठार शामिल था, जिसमें गोंड, हल्बा, ध्रुव (दोरला) और अन्य समुदायों का जनजातीय हृदय-भूमि शामिल थी।
अंग्रेजों ने बस्तर पर अपनी आकार, इसकी जनजातीय आबादी, इसके वन संपदा और हैदराबाद दक्कन की सीमा पर इसकी रणनीतिक स्थिति के कारण कड़ी नज़र रखी। 1910 का भुमकाल विद्रोह — महान जनजातीय विद्रोह जिसने बस्तर को अपनी नींव से हिला दिया — ने सबसे अलग-थलग सामंतशाही राज्य के भीतर भी असंतोष की विस्फोटक क्षमता का प्रदर्शन किया। विद्रोह दबाए जाने के बाद, अंग्रेजों ने कड़ा प्रशासनिक पर्यवेक्षण शुरू किया।
स्वतंत्रता और विलय अवधि के दौरान, बस्तर के शासकों ने शुरू में राज्य के आकार और इसके जनजातीय शासन की जटिलता को देखते हुए विलय के बारे में झिझक दिखाई। हालांकि, सरदार वल्लभभाई पटेल और उनके राजनीतिक सचिव वी.पी. मेनन द्वारा लागू कूटनीतिक दबाव निर्णायक साबित हुआ।
सरगुजा, कोरिया और रायगढ़
सरगुजा (Surguja, जिसे Sarguja भी लिखा जाता है) उत्तरी छत्तीसगढ़ की एक और बड़ी रियासत थी, जो हसदेव नदी बेसिन और आस-पास के क्षेत्रों के अधिकांश भाग को कवर करती थी। सरगुजा का शासक वंश रक्सेल (गौर राजपूत की एक शाखा) मूल का था। सरगुजा का महत्व इसके कोयला-युक्त भूभाग, इसके घने वन आवरण और इसकी बड़ी जनजातीय आबादी (मुख्य रूप से उराँव और उराँव समुदाय) में निहित है।
कोरिया (Koriya) सरगुजा के उत्तर-पूर्व में एक छोटा राज्य था, जो अपने कोयला भंडार के लिए भी महत्वपूर्ण था। कोरिया के शासक परिवार के सरगुजा शासकों और पड़ोसी राज्यों दोनों के साथ जटिल रिश्तेदारी संबंध थे।
पूर्वी छत्तीसगढ़ में रायगढ़ राज्य अपने सांस्कृतिक संरक्षण — विशेष रूप से शास्त्रीय संगीत और प्रदर्शन कलाओं के लिए उल्लेखनीय था। रायगढ़ के शासक अपने दरबार में कथक और अन्य शास्त्रीय नृत्य रूपों को लाने के लिए जाने जाते थे, और कथक का रायगढ़ घराना राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हो गया।
एकीकरण और विलय प्रक्रिया (1947–1948)
संवैधानिक ढाँचा
जब 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, तो भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 (एक ब्रिटिश संसदीय क़ानून) ने औपचारिक रूप से प्रभुत्व (paramountcy) — वह संबंध जिसने रियासतों को ब्रिटिश क्राउन से जोड़ा था — को समाप्त कर दिया। इसने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक शून्य पैदा किया: प्रत्येक रियासत, तकनीकी कानूनी शब्दों में, अपना भविष्य चुनने के लिए स्वतंत्र थी।
सरदार पटेल, पहले उप-प्रधानमंत्री और राज्य मंत्रालय के मंत्री के रूप में, दोहरी रणनीति अपनाई। उन रियासतों के विशाल बहुमत के लिए जिनका क्षेत्र भौगोलिक रूप से भारत में एकीकृत था (पाकिस्तान से सटे होने के विपरीत), उन्होंने कूटनीतिक समझाने को एक स्पष्ट संदेश के साथ जोड़ा: उन राज्यों के लिए भारत के साथ एकीकरण अपरिहार्य था जो स्वतंत्र रूप से व्यवहार्य रूप से कार्य नहीं कर सकते थे, और दी जा रही शर्तें — प्रिवी पर्स, व्यक्तिगत विशेषाधिकार, कुछ औपचारिक अधिकारों की निरंतरता — उदार थीं। जो राज्य झिझकते थे, उन पर दबाव व्यवस्थित रूप से बढ़ाया गया।
छत्तीसगढ़ की सामंतशाही रियासतों ने बड़ी और अधिक शक्तिशाली रियासतों (जैसे हैदराबाद, कश्मीर, या त्रावणकोर) की तुलना में कुछ हद तक सरल एकीकरण चुनौती प्रस्तुत की क्योंकि उनके शासकों के पास आम तौर पर निरंतर स्वतंत्रता के लिए सैन्य या वित्तीय क्षमता का अभाव था। उनके क्षेत्र भी ब्रिटिश-प्रशासित छत्तीसगढ़ के साथ गहराई से जुड़े हुए थे — सड़कें, रेलवे, नदी प्रणाली और बाजार सभी ब्रिटिश जिलों से होकर गुजरते थे।
विलय-पत्रों पर हस्ताक्षर
जुलाई और अक्टूबर 1947 के बीच, भारत की लगभग सभी रियासतों ने अपने विलय-पत्रों (Instruments of Accession) पर हस्ताक्षर किए, जिसमें वे रक्षा, विदेशी मामलों और संचार को भारत अधिराज्य को सौंपने पर सहमत हुईं। छत्तीसगढ़ की सामंतशाही रियासतों ने भी ऐसा ही किया। अगला कदम विलय समझौता (Merger Agreement) था, जिसने इन राज्यों की शेष संप्रभुता को समाप्त कर दिया और उन्हें विशिष्ट प्रशासनिक इकाइयों में विलय कर दिया।
छत्तीसगढ़ की सामंतशाही रियासतों का केंद्रीय प्रांतों और बरार — ब्रिटिश युग का प्रशासनिक प्रांत जो हमेशा उनके चारों ओर था — में विलय कर दिया गया। यह विलय अधिकांश राज्यों के लिए 1 जनवरी 1948 तक पूरा हो गया था, हालांकि सटीक तिथियाँ राज्य के अनुसार भिन्न थीं। विलय के बाद, पूर्व शासकों को उनके प्रिवी पर्स (विलय समझौतों में वार्षिक राशियों के रूप में निर्दिष्ट) प्राप्त हुए और उन्हें न्यायिक, कार्यकारी और विधायी अधिकार से वंचित कर दिया गया।
मध्य प्रदेश का गठन (1950 और 1956)
जब भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ, तो पूर्व केंद्रीय प्रांतों और बरार (विलयित छत्तीसगढ़ सामंतशाही राज्यों सहित) का नाम बदलकर मध्य प्रदेश कर दिया गया और इसे नए संवैधानिक ढाँचे में भाग A राज्य के रूप में गठित किया गया। जिन पूर्व रियासतों का विलय हो चुका था, वे इस पुनर्गठित मध्य प्रदेश का हिस्सा बन गईं।
हालांकि, राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 ने अधिक व्यापक परिवर्तन लाया। इस अधिनियम ने भाग A, B, C, D वर्गीकरण को समाप्त कर दिया और मुख्य रूप से भाषाई पहचान के आधार पर भारत के राज्यों का पुनर्गठन किया। मध्य भारत के लिए इसका परिणाम एक बहुत बड़े मध्य प्रदेश का निर्माण था जिसने मध्य भारत, विंध्य प्रदेश, भोपाल राज्य और मौजूदा मध्य प्रदेश को अवशोषित कर लिया। इसने मध्य प्रदेश को क्षेत्रफल के हिसाब से भारत के सबसे बड़े राज्यों में से एक बना दिया, जिसमें छत्तीसगढ़ क्षेत्र इसका पूर्वी भाग बना।
इस अंतर को याद रखना महत्वपूर्ण है: राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 ने विस्तृत मध्य प्रदेश का निर्माण किया जिसने छत्तीसगढ़ को अपने में समाहित कर लिया, लेकिन मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 वह साधन है जिसने छत्तीसगढ़ को उससे अलग किया। 2019 के CGPSC प्रश्न ने ठीक इसी अंतर को परखा था।
तुलना: छत्तीसगढ़ के क्षेत्रीय इतिहास से संबंधित प्रमुख अधिनियम
| अधिनियम / साधन | वर्ष | इसने क्या किया | छत्तीसगढ़ से प्रासंगिकता |
|---|---|---|---|
| भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (Indian Independence Act) | 1947 | ब्रिटिश प्रभुत्व समाप्त किया; दो अधिराज्य बनाए | सभी रियासतों के लिए विलय प्रक्रिया शुरू की |
| विलय-पत्र (Instrument of Accession, विभिन्न) | 1947 | प्रत्येक शासक ने रक्षा, विदेशी मामले, संचार भारत को सौंपे | सभी छत्तीसगढ़ सामंतशाही राज्यों ने अक्टूबर 1947 तक हस्ताक्षर किए |
| विलय समझौते (Merger Agreements) | 1947–48 | पूर्ण संप्रभुता हस्तांतरित; प्रिवी पर्स प्रदान किए गए | छत्तीसगढ़ सामंतशाही राज्यों का केंद्रीय प्रांतों और बरार में विलय |
| भारत का संविधान (Constitution of India) | 1950 | क्षेत्र का पुनर्गठन; केंद्रीय प्रांत और बरार → मध्य प्रदेश (भाग A) | छत्तीसगढ़ MP का हिस्सा बना |
| राज्य पुनर्गठन अधिनियम (States Reorganisation Act) | 1956 | भाषाई पुनर्गठन; विस्तृत मध्य प्रदेश का निर्माण | छत्तीसगढ़ क्षेत्र बड़े MP में समाहित; 44 वर्षों तक वहाँ रहा |
| 26वाँ संवैधानिक संशोधन (26th Constitutional Amendment) | 1971 | प्रिवी पर्स समाप्त किए | पूर्व छत्तीसगढ़ शासकों को गारंटीकृत वार्षिक भुगतान बंद |
| मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम (Madhya Pradesh Reorganisation Act) | 2000 | MP को शेष MP और नए छत्तीसगढ़ में विभाजित किया | छत्तीसगढ़ राज्य का कानूनी जन्म प्रमाण पत्र (CGPSC 2019 में परखा गया) |
राज्य आंदोलन: आकांक्षा से उपलब्धि तक
अलग राज्य की मांग की उत्पत्ति
अलग छत्तीसगढ़ राज्य की मांग 1990 के दशक में शुरू नहीं हुई — इसकी जड़ें बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों तक फैली हुई हैं। छत्तीसगढ़ी भाषी आबादी की भाषाई और सांस्कृतिक विशिष्टता, दूर स्थित भोपाल की राज्य सरकार द्वारा आर्थिक रूप से शोषित और प्रशासनिक रूप से उपेक्षित होने की भावना, और क्षेत्र की बड़ी जनजातीय आबादी की विशेष चिंताएँ — सभी ने क्षेत्रीय पहचान की एक सतत अंतर्धारा को पोषित किया।
एक पृथक छत्तीसगढ़ के लिए औपचारिक राजनीतिक मांग पहली बार 1950 के दशक में संगठित रूप में व्यक्त की गई, जब राज्य पुनर्गठन आयोग विचार-विमर्श कर रहा था। क्षेत्र की आवाज़ों ने तर्क दिया कि एक छत्तीसगढ़ी पहचान — भाषा, संस्कृति और दक्कन के पठार और इसके जनजातीय समुदायों की विशेष पारिस्थितिकी द्वारा परिभाषित — अलग राजनीतिक मान्यता की हकदार है। हालांकि, आयोग ने प्रशासनिक दक्षता के आधार पर एक समेकित मध्य प्रदेश का विकल्प चुना।
आर्थिक अविकास और अलगाव का तर्क
वह शिकायत जिसने राज्य आंदोलन को किसी भी अन्य से अधिक प्रेरित किया, वह आर्थिक थी। छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संसाधनों में असाधारण रूप से समृद्ध था (और है) — कोयला, लौह अयस्क, चूना पत्थर, डोलोमाइट, बॉक्साइट और वन उपज — फिर भी यह क्षेत्र मानव विकास संकेतकों द्वारा भारत के सबसे गरीब क्षेत्रों में से एक बना रहा। संसाधन संपदा और बड़े पैमाने पर गरीबी के सह-अस्तित्व के इस विरोधाभास को औपनिवेशिक दोहन के एक रूप के रूप में अनुभव किया गया: छत्तीसगढ़ के संसाधनों का दोहन व्यापक अर्थव्यवस्था के लाभ के लिए किया जा रहा था, जबकि क्षेत्र की आबादी अविकसित रह गई थी।
इस तर्क को इस अवलोकन द्वारा और अधिक तीक्ष्ण रूप दिया गया कि भोपाल में राज्य की राजधानी छत्तीसगढ़ से भौगोलिक रूप से दूर थी (रायपुर से लगभग 700 किलोमीटर), जिसका अर्थ था कि राज्य-स्तरीय योजना और बजट आवंटन में क्षेत्र की जरूरतों का खराब प्रतिनिधित्व था। छत्तीसगढ़ में सड़कें, स्कूल, अस्पताल और सिंचाई बुनियादी ढाँचा मध्य प्रदेश के पश्चिमी जिलों से काफी पीछे थे।
छत्तीसगढ़ के जनजातीय समुदायों — गोंड, उराँव, बैगा, हल्बा, कामार और दर्जनों अन्य समूहों — ने तर्क में एक और आयाम जोड़ा। ये समुदाय, विशेष रूप से बस्तर, सरगुजा और कोरिया जिलों में केंद्रित, स्वायत्तता, वन अधिकारों और बड़ी बाँध और खनन परियोजनाओं द्वारा विस्थापन से सुरक्षा के लिए अपनी अलग माँगें रखते थे। राज्य आंदोलन ने इन आवाज़ों को एक राजनीतिक माध्यम दिया, भले ही अंतिम परिणाम ने उनके हितों की केवल आंशिक रूप से सेवा की।
प्रमुख संगठन और राजनीतिक अभिनेता
कई संगठनों ने दशकों तक राज्य आंदोलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
छत्तीसगढ़ महासभा एक अलग छत्तीसगढ़ पहचान की वकालत करने वाले शुरुआती संगठनों में से एक था, जो स्वतंत्रता से पहले का है। स्वतंत्रता के बाद, आंदोलन को वैचारिक स्पेक्ट्रम के विभिन्न राजनीतिक समूहों से समर्थन मिला — खनन और इस्पात बेल्ट (भिलाई, कोरबा, रायगढ़) में समाजवादी और कम्युनिस्ट-संबद्ध आंदोलनों से लेकर, कांग्रेस के राजनेताओं तक जिन्होंने क्षेत्रीय आकांक्षाओं का समर्थन करने के लिए पार्टी लाइन को तोड़ा, और जनजातीय कल्याण संगठनों तक।
खूबचंद बघेल को अक्सर स्वतंत्रता-पश्चात काल में संगठित छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन का जनक माना जाता है। एक कांग्रेसी और समाज सुधारक, बघेल ने अलग राज्य के लिए सांस्कृतिक और विकासात्मक शब्दों में तर्क प्रस्तुत किया जो जनता के साथ प्रतिध्वनित हुआ। उनकी विरासत को आज राज्य में स्मरण किया जाता है।
1990 के दशक तक, आंदोलन ने ऐसी गति प्राप्त कर ली थी जिसे राजनीतिक रूप से अनदेखा करना असंभव हो गया था। 1991 के आर्थिक सुधारों ने, जिसने भारत के प्राकृतिक संसाधन क्षेत्र को अधिक कॉरपोरेट निवेश के लिए खोल दिया, छत्तीसगढ़ के विकास की संभावना और इस डर दोनों को तीव्र कर दिया कि क्षेत्र की संपदा का स्थानीय लाभ के बिना दोहन किया जाएगा — जब तक कि उन सौदों पर बातचीत करने के लिए क्षेत्र की अपनी राज्य सरकार न हो।
भाजपा सरकार और राजनीतिक सफलता
निर्णायक राजनीतिक क्षण तब आया जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने छत्तीसगढ़ राज्य को एक घोषणापत्र वचनबद्धता के रूप में शामिल किया और केंद्र में सत्ता जीतने पर, उस वादे को पूरा करने के लिए आगे बढ़ी। कांग्रेस पार्टी, जो लंबे समय से मांग के बारे में उभयभावी थी, ने राजनीतिक रूप से पीछे छूटने से बचने के लिए अंततः विधान का समर्थन किया।
छत्तीसगढ़ बनाने का विधेयक — मध्य प्रदेश पुनर्गठन विधेयक — जुलाई-अगस्त 2000 में संसद द्वारा पारित किया गया। मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 1 नवम्बर 2000 को लागू हुआ, जिसने रायपुर में अपनी राजधानी के साथ छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण किया। यह तिथि जानबूझकर मध्य प्रदेश के गठन की वर्षगाँठ (जो 1 नवम्बर 1956 को बना था) के साथ मेल खाने के लिए चुनी गई थी — प्रतीकात्मक प्रतिध्वनि वाली तिथि।
अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री बने, जिन्होंने प्रारंभिक प्रशासनिक व्यवस्था किए जाने के बाद स्थापित कांग्रेस सरकार का नेतृत्व किया।
तुलना: 2000 में बनाए गए तीन राज्यों की विशेषताएँ
वर्ष 2000 में मौजूदा बड़े राज्यों से तीन नए राज्यों का एक साथ निर्माण हुआ। तुलनात्मक संदर्भ को समझना गहन विश्लेषण और तुलनात्मक जागरूकता का परीक्षण करने वाले परीक्षा प्रश्नों दोनों के लिए उपयोगी है।
| विशेषता | छत्तीसगढ़ (MP से) | झारखंड (बिहार से) | उत्तराखंड/उत्तरांचल (UP से) |
|---|---|---|---|
| गठन की तिथि | 1 नवम्बर 2000 | 15 नवम्बर 2000 | 9 नवम्बर 2000 |
| मूल राज्य | मध्य प्रदेश | बिहार | उत्तर प्रदेश |
| कानूनी साधन | MP पुनर्गठन अधिनियम, 2000 | बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 | UP पुनर्गठन अधिनियम, 2000 |
| पहले मुख्यमंत्री | अजीत जोगी (INC) | बाबूलाल मरांडी (भाजपा) | नित्यानंद स्वामी (भाजपा) |
| राजधानी | रायपुर | रांची | देहरादून (अंतरिम) |
| प्राथमिक तर्क | संसाधन संपदा + जनजातीय पहचान + प्रशासनिक उपेक्षा | झारखंड आंदोलन + जनजातीय पहचान | पहाड़ी क्षेत्र पहचान + प्रशासनिक उपेक्षा |
| क्षेत्रफल (लगभग) | ~135,000 वर्ग किमी | ~79,000 वर्ग किमी | ~53,000 वर्ग किमी |
| भारत का राज्य क्रमांक | 26वाँ राज्य | 28वाँ राज्य | 27वाँ राज्य |
संभावित परीक्षा प्रश्न
यह समझना कि CGPSC ने अतीत में क्या पूछा है और भविष्य में पूछे जाने की संभावना क्या है, इसका अनुमान लगाना एक आवश्यक परीक्षा कौशल है। इस उप-विषय ने दो पुष्ट पीवाईक्यू (2019 और 2020) दिए हैं, और पैटर्न बताता है कि भविष्य के प्रश्न व्यापक वैचारिक समझ के बजाय विशिष्ट तथ्यात्मक विवरणों की जांच करना जारी रखेंगे।
छत्तीसगढ़ के गठन के कानूनी साधन के बारे में प्रश्न संभवतः दिखाई देते रहेंगे। जाल हमेशा राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 होता है, जो प्रासंगिक लगता है क्योंकि इसने राज्यों का पुनर्गठन किया लेकिन वास्तव में यह वह अधिनियम है जिसने विस्तृत मध्य प्रदेश बनाया — न कि वह अधिनियम जिसने छत्तीसगढ़ बनाया। सही उत्तर हमेशा मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 होता है। विविधताओं में यह पूछा जा सकता है कि किस संसद सत्र ने विधेयक पारित किया, गठन की सटीक तिथि (1 नवम्बर 2000), या विधेयक संख्या।
व्यक्तिगत रियासती शासकों के बारे में प्रश्न 2020 के प्रफुल्ल कुमारी देवी प्रश्न की शैली में जारी रहेंगे। परीक्षा बोर्ड की गैर-स्पष्ट तथ्यों — शासकों का लिंग, राज्यारोहण पर सटीक आयु, राज्याभिषेक का सटीक वर्ष — में विशेष रुचि प्रतीत होती है। भविष्य के प्रश्न बस्तर (सबसे बड़ा राज्य), रायगढ़ (सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण), सरगुजा, या कोरिया के शासकों पर केंद्रित हो सकते हैं। "निम्नलिखित कथनों का अध्ययन करें" (एक बहु-कथन सत्य/असत्य प्रारूप) का प्रश्न प्रारूप संभवतः दोहराया जाएगा।
विलय प्रक्रिया के बारे में प्रश्न यह पूछ सकते हैं कि रियासतों के एकीकरण के लिए कौन जिम्मेदार था (सरदार पटेल और वी.पी. मेनन), किस साधन का उपयोग किया गया (विलय-पत्र इसके बाद विलय समझौता), और बदले में पूर्व शासकों को क्या मिला (प्रिवी पर्स, बाद में 1971 में समाप्त)।
राज्य आंदोलन के बारे में प्रश्न प्रमुख हस्तियों (खूबचंद बघेल), इसमें शामिल संगठनों, प्राथमिक तर्कों (आर्थिक अविकास, प्रशासनिक उपेक्षा, जनजातीय कल्याण), या गठन के वर्ष और पहले मुख्यमंत्री के बारे में पूछ सकते हैं।
छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय संदर्भ से जोड़ने वाले प्रश्न राज्य पुनर्गठन के बारे में पूछ सकते हैं कि 2000 में कितने राज्य बनाए गए (तीन), वे कौन से राज्य थे, और कानूनी साधन क्या थे।
भविष्य के प्रश्नों के लिए एक विशेष रूप से समृद्ध क्षेत्र प्रिवी पर्स का उन्मूलन है — 1971 के 26वें संवैधानिक संशोधन के छत्तीसगढ़ की सभी सामंतशाही रियासतों के पूर्व शासकों के लिए सीधे परिणाम थे, और इन परिवारों के संवैधानिक इतिहास के इर्द-गिर्द बने प्रश्न सटीक कानूनी-ऐतिहासिक विवरण में परीक्षा की रुचि के अनुरूप हैं।
परीक्षा 2000 से पहले छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक इतिहास के बारे में भी पूछ सकती है — विशेष रूप से, क्या छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश के भीतर एक अलग प्रशासनिक प्रभाग के रूप में अस्तित्व में था (यह एक प्रभाग या संभाग के रूप में था), और इसमें कौन से जिले शामिल थे।
सामान्य गलतियाँ और जाल
राज्य पुनर्गठन अधिनियम (1956) को MP पुनर्गठन अधिनियम (2000) से भ्रमित करना। यह इस उप-विषय में सबसे अधिक परीक्षित जाल है (यह सीधे CGPSC 2019 में दिखाई दिया)। राज्य पुनर्गठन अधिनियम ने विस्तृत मध्य प्रदेश बनाया — इसने छत्तीसगढ़ को अपने में समाहित किया, इसे नहीं बनाया। मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 ने छत्तीसगढ़ बनाया। इसके अतिरिक्त, 2019 के प्रश्न में एक व्याकुलता भी शामिल थी — राजस्थान और मध्य प्रदेश (क्षेत्रों का हस्तांतरण) अधिनियम — जो प्रशंसनीय लगता है लेकिन एक अलग और पहले के क्षेत्रीय समायोजन को संदर्भित करता है जिसका छत्तीसगढ़ को एक राज्य के रूप में बनाने से कोई लेना-देना नहीं था।
रियासतों की गिनती में गलती करना। विभिन्न स्रोत छत्तीसगढ़ की सामंतशाही रियासतों के लिए अलग-अलग संख्याएँ देते हैं (चौदह से अठारह या अधिक तक, इस पर निर्भर करता है कि कौन सी छोटी ज़मींदारियाँ शामिल हैं)। CGPSC परीक्षा आमतौर पर कुल गणना के बजाय विशिष्ट नामित राज्यों के बारे में पूछती है, इसलिए प्रमुख राज्यों को अलग-अलग याद करें।
विलय-पत्र को विलय समझौते के साथ भ्रमित करना। ये दो अलग-अलग दस्तावेज़ हैं। विलय-पत्र ने केवल तीन विषयों (रक्षा, विदेशी मामले, संचार) को हस्तांतरित किया और शासक को आंतरिक संप्रभुता के साथ छोड़ दिया। विलय समझौता एक बाद का, सभी संप्रभु अधिकार का अधिक व्यापक हस्तांतरण था। छत्तीसगढ़ की सामंतशाही रियासतों के साथ हुए पूर्ण एकीकरण के लिए दोनों की आवश्यकता थी।
राज्य आंदोलन को एक ही राजनीतिक दल के लिए जिम्मेदार ठहराना। यह आंदोलन वास्तव में अंतर-दलीय था और इसके लंबे इतिहास में कांग्रेस, समाजवादी, कम्युनिस्ट और भाजपा हलकों में समर्थक थे। जबकि केंद्र में भाजपा सरकार वह राजनीतिक शक्ति थी जिसने अंततः विधान को अधिनियमित किया, आकांक्षाएँ बहुत पुरानी और व्यापक थीं।
यह भूल जाना कि छत्तीसगढ़ भारत का 26वाँ राज्य था, न कि 27वाँ या 28वाँ। 2000 में गठित तीन राज्यों में से, उत्तरांचल (अब उत्तराखंड) 9 नवम्बर को, छत्तीसगढ़ 1 नवम्बर को और झारखंड 15 नवम्बर को बना था। 2000 के भीतर क्रम के संदर्भ में, छत्तीसगढ़ कालानुक्रमिक रूप से पहले आया।
प्रफुल्ल कुमारी देवी के बारे में गलत विवरण। CGPSC 2020 के प्रश्न ने पुष्टि की कि उनके बारे में तीनों कथन — दूसरी महिला शासक, 1916 में राज्यारोहण, बारह वर्ष की आयु — सत्य थे। एक सामान्य गलती यह होगी कि इनमें से किसी एक को असत्य चिह्नित किया जाए जबकि वे सभी सही हैं।
स्मृति सहायक और संकेताक्षर
संकेताक्षर 1: "MRAPRO 2000" — छत्तीसगढ़ का जन्म
यह याद रखने के लिए कि मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम (राज्य पुनर्गठन अधिनियम नहीं) ने छत्तीसगढ़ बनाया, इसका उपयोग करें:
"MP Reorganised, CG Born — Never States Act"
विस्तारित: Madhya Pradesh Reorganisation Act 2000 = Chhattisgarh Born.
शब्द "Never" आपको याद दिलाता है कि States Reorganisation Act (1956) एक व्याकुलता है — छत्तीसगढ़ के निर्माण के लिए कभी उत्तर नहीं।
वैकल्पिक रूप से, दृश्य की कल्पना करें: छत्तीसगढ़ एक बच्च