परिचय
भारत छोड़ो आंदोलन (अगस्त 1942–1945) भारत की स्वतंत्रता-गाथा का सबसे निर्णायक जनसंघर्ष है—जनप्रतिरोध का वह भूकंपीय विस्फोट जिसने राष्ट्र को 1947 की स्वतंत्रता की ओर अग्रसर किया। बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) परीक्षा के विद्यार्थियों के लिए यह उपविषय केवल आधुनिक भारतीय इतिहास का एक अध्याय भर नहीं है; यह वह लेंस है जिसके माध्यम से बिहार की 'प्रतिरोध की भूमि' के रूप में अनूठी पहचान स्पष्ट रूप से उभरती है। इस आंदोलन में बिहार के हर जिले से अभूतपूर्व भागीदारी देखी गई—ग्रामीण जनसमूह से लेकर शहरी बुद्धिजीवी वर्ग तक, किसानों से लेकर वकीलों तक, महिलाओं से लेकर छात्रों तक। BPSC परीक्षाओं में 2019 से 2025 के बीच पूछे गए 11 पिछले वर्षों के प्रश्न (PYQs) इस उपविषय पर बार-बार दिए जाने वाले जोर की गवाही देते हैं: प्रश्न न केवल आंदोलन की व्यापक रूपरेखा की परीक्षा लेते हैं, बल्कि गुमनाम स्थानीय नायकों, भूमिगत रेडियो प्रसारणों, जेल से पलायन, समानांतर सरकारों और उस युग को परिभाषित करने वाले विशिष्ट नारों की भी। इन प्रश्नों की गहराई और विशिष्टता—"सर्चलाइट अखबार के संपादक कौन थे?" (BPSC 2019) से लेकर "भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 'गुप्त रेडियो' किसने प्रारंभ किया?" (BPSC 2022, 2021) से लेकर "बिक्रम थाना क्षेत्र में राष्ट्रीय ध्वज फहराते समय किसकी हत्या कर दी गई?" (BPSC 2025) तक—परीक्षक की उस मंशा को रेखांकित करती है जो विस्तृत, स्थानीय रूप से आधारित ज्ञान को पुरस्कृत करना चाहती है।
बिहार की इतनी केंद्रीय भूमिका क्यों रही? भौगोलिक दृष्टि से बिहार आंदोलन के पूर्वी और उत्तरी रंगमंचों के बीच का गलियारा था। राजनीतिक दृष्टि से यह प्रांत श्री कृष्ण सिंह ('बिहार केसरी'), डॉ. राजेंद्र प्रसाद (भारत के प्रथम राष्ट्रपति), अनुग्रह नारायण सिन्हा, जयप्रकाश नारायण, और राम मनोहर लोहिया — जैसे कद्दावर नेताओं का घर था, जिनमें से प्रत्येक ने आंदोलन पर अमिट छाप छोड़ी। 1942 का बिहार उभार कोई इकलौती घटना नहीं थी; यह एक सदी की राजनीतिक चेतना की पराकाष्ठा थी, चंपारण सत्याग्रह (1917) से लेकर असहयोग आंदोलन (1920–22) और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–34) तक। 1857 के विद्रोह में भी कुंवर सिंह के नेतृत्व में बिहार में महत्वपूर्ण गतिविधि देखी गई थी। 1942 तक प्रांत जन-कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार था।
BPSC के आधिकारिक इतिहास पाठ्यक्रम में व्यापक विषयगत क्षेत्र शामिल हैं: प्राचीन बिहार (मगध, मौर्य, नालंदा, विक्रमशिला), प्राचीन भारत (सिंधु घाटी से गुप्त काल तक), मध्यकालीन भारत (सल्तनत, मुगल, भक्ति), आधुनिक भारत (ब्रिटिश शासन, सामाजिक-धार्मिक सुधार), और मध्यकाल में बिहार (शेरशाह सूरी, मुगल शासन)। यद्यपि यह अध्याय भारत छोड़ो आंदोलन पर केंद्रित है, हम इन व्यापक सूत्रों को वहाँ बुनेंगे जहाँ वे संदर्भ को स्पष्ट करते हैं—उदाहरण के लिए, कैसे मगधीय राजनय की विरासत ने औपनिवेशिक काल के राष्ट्रवाद को प्रभावित किया, या शेरशाह की प्रशासनिक व्यवस्था ने बिहार के ग्रामीण शासन को किस प्रकार आकार दिया, जिसने बाद में 1942 की समानांतर सरकारों को बल दिया। उद्देश्य अभ्यर्थी को स्तरित समझ देना है, तिथियों की सूची नहीं।
यह अध्याय आपको इन सभी प्रश्नों का उत्तर देने में सक्षम बनाएगा: आंदोलन का शुभारंभ और नारा; बिहार के नेताओं की भूमिका; गुप्त रेडियो और आजाद दस्ता जैसी भूमिगत गतिविधियाँ; पूरे भारत में समानांतर सरकारें, विशेषकर बिहार पर केंद्रित; जयप्रकाश नारायण का पलायन; बिक्रम थाना पर दमन और शहादत; जिन्ना की "बाँटो और छोड़ो" बयानबाजी से तुलना; और भारत की स्वतंत्रता में बिहार के योगदान का ऐतिहासिक महत्व। हम PYQs से सीखेंगे, भविष्य के प्रश्नों का अनुमान लगाएंगे, और ऐसे स्मृति-सहायक (memory aids) बनाएंगे जो याद रखना सहज बना दें।
मूल अवधारणाएँ एवं आधार
इस उपविषय में निपुणता हेतु अभ्यर्थी को अवधारणाओं के एक समूह को आत्मसात करना होगा—प्रत्येक को नीचे परिभाषित किया गया है, त्वरित पुनरावलोकन हेतु ब्लॉकक्वोट कॉलआउट के साथ।
भारत छोड़ो आंदोलन: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा 9 अगस्त 1942 को शुरू किया गया जनसिविल अवज्ञा आंदोलन, जिसमें भारत में ब्रिटिश शासन के अंत की मांग की गई थी। यह क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद आरंभ हुआ और महात्मा गांधी द्वारा दिए गए "करो या मरो" के नारे से चिह्नित था। आंदोलन में व्यापक भागीदारी, कठोर दमन, और सभी प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी देखी गई।
अगस्त क्रांति: वह दिन (9 अगस्त 1942) जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने बंबई अधिवेशन में भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया। "अगस्त क्रांति" शब्द आंदोलन के शुभारंभ को दर्शाता है और प्रायः भारत छोड़ो आंदोलन की प्रारंभिक जोशीली गतिविधि के पर्याय के रूप में प्रयोग होता है। बिहार में यह पुकार उसी दिन से हड़तालों, जुलूसों, और सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमलों के साथ अपनाई गई।
करो या मरो (Do or Die): 8 अगस्त 1942 को गोवालिया टैंक मैदान, बंबई में महात्मा गांधी द्वारा दिया गया प्रेरक नारा। यह तत्काल एवं समझौताविहीन कार्रवाई का आह्वान था—आंदोलन को अंतिम, निर्णायक संघर्ष बनना था। BPSC 2024 में परखा गया, सही संबद्धता भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गांधीजी से है। यह "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है" (बाल गंगाधर तिलक) या "जय हिंद" (सुभाष चंद्र बोस) जैसे पूर्ववर्ती नारों से भिन्न है।
क्रिप्स मिशन (1942): सर स्टैफर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में एक ब्रिटिश मिशन जिसने युद्ध के बाद भारत को अधिराज्य (डोमिनियन) दर्जा देने का प्रस्ताव रखा, साथ ही अलग होने का अधिकार भी। कांग्रेस ने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया क्योंकि इसमें सत्ता का तत्काल हस्तांतरण नहीं था और प्रांतों को अलग होने की अनुमति थी, जो प्रभावी रूप से पाकिस्तान बनने का मार्ग प्रशस्त करता। इस मिशन की विफलता ने सीधे भारत छोड़ो आंदोलन को जन्म दिया।
समानांतर सरकारें (सरकार): भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के बाद कई क्षेत्रों में भारतीय राष्ट्रवादियों द्वारा स्थापित स्थानीय, भूमिगत प्रशासन। इनमें सतारा (महाराष्ट्र) में प्रति सरकार, तामलुक (बंगाल) में जातीय सरकार, तालचर (ओडिशा) में प्रजा मंडल, तथा खेड़ा (गुजरात) में रैयती सरकार शामिल थे। हालाँकि, BPSC 2024 में परखा गया कि "रैयती सरकार – खेड़ा" युग्म गलत है; वास्तव में खेड़ा का उभार पूर्ववर्ती खेड़ा सत्याग्रह (1918) का हिस्सा था, और "रैयती सरकार" शब्द 1942 के लिए प्रामाणिक नहीं है—खेड़ा में सही संबद्धता खेड़ा सत्याग्रह काल से है, न कि भारत छोड़ो आंदोलन से। यह सूक्ष्मता मिलान प्रश्नों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आजाद दस्ता: भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बिहार में सक्रिय एक अर्धसैनिक स्वयंसेवी समूह, जैसा BPSC 2021 में परखा गया। ये "मुक्ति दस्ते" तोड़फोड़, गुप्तचरी, तथा राष्ट्रवादी साहित्य वितरण में संलग्न थे। ये विशेष रूप से पटना, गया, और शाहाबाद जिलों में सक्रिय थे, और प्रायः भूतपूर्व सैनिकों तथा छात्रों से बने थे।
गुप्त रेडियो (उषा मेहता): उषा मेहता और उनके सहयोगियों द्वारा बंबई से संचालित एक गुप्त रेडियो स्टेशन, जो कांग्रेस के संदेश प्रसारित करता, असहयोग को बढ़ावा देता, और ब्रिटिश प्रचार का प्रतिकार करता था। यह लगभग 13 अगस्त 1942 को प्रारंभ हुआ। दो बार परखा गया (BPSC 2022, 2021)। उषा मेहता को बाद में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। प्रेस पर पाबंदी के बाद यह रेडियो भूमिगत संचार का महत्वपूर्ण साधन था।
सर्चलाइट समाचारपत्र: पटना से प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अंग्रेजी भाषा का समाचारपत्र, जो बिहार में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का मुखपत्र था। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान इसके संपादक मुरली मोहन प्रसाद थे (BPSC 2019 में परखा गया)। इस अखबार ने आंदोलन की खबरें फैलाने और जनमत जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बिहार केसरी: श्री कृष्ण सिंह को दी गई उपाधि, जो बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री और एक प्रमुख कांग्रेस नेता थे। उन्होंने अटूट संकल्प के साथ बिहार में आंदोलन का नेतृत्व किया, कई बार गिरफ्तार हुए, और क्षेत्र की उग्र देशभक्ति के प्रतीक बने। BPSC 2023 में परखा गया।
बाँटो और छोड़ो (Divide and Quit): भारत छोड़ो आंदोलन की प्रतिक्रिया में एम.ए. जिन्ना द्वारा उठाया गया नारा। जहाँ कांग्रेस ने माँग की कि ब्रिटिश "भारत छोड़ो", वहीं जिन्ना ने तर्क दिया कि ब्रिटिश को "बाँटो और छोड़ो" चाहिए, अर्थात जाने से पहले भारत का विभाजन करें। BPSC 2025 में परखा गया। यह नारा कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच की वैचारिक खाई को दर्शाता है।
हजारीबाग जेल पलायन: 1942 में दीवाली की रात जयप्रकाश नारायण (जेपी) का हजारीबाग केंद्रीय कारागार से कई अन्य कैदियों के साथ नाटकीय पलायन। BPSC 2021 और 2022 में परखा गया, जहाँ त्योहार दीपावली (दिवाली) बताया गया। जेपी ने दीवार फांदने के लिए त्योहारी अफरातफरी (पटाखे, भीड़) का लाभ उठाया। इसके बाद उन्होंने बिहार और नेपाल में भूमिगत प्रतिरोध का नेतृत्व किया।
रघुनाथ सिंह शहादत: वह घटना जिसमें गोरखपुर (अब उत्तर प्रदेश में, परंतु घटनास्थल बिहार में बिक्रम थाना है) के निवासी रघुनाथ सिंह को अगस्त 1942 में राष्ट्रीय ध्वज फहराते समय गोली मार दी गई। BPSC 2025 में परखा गया। यह ध्वजारोहण को अवज्ञा के कार्य के रूप में इसके व्यापक स्वरूप को उजागर करता है।
अब जब वैचारिक टूलकिट स्पष्ट है, हम उन गहन खंडों की ओर बढ़ते हैं जो इन शब्दों को व्यापक कथानक से जोड़ते हैं।