परिचय
बिहार में असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन का अध्ययन BPSC के लिए आधुनिक भारतीय इतिहास पाठ्यक्रम का एक महत्वपूर्ण उप-घटक है। बिहार राष्ट्रीय आंदोलन का निष्क्रिय दर्शक नहीं था; बल्कि, यह राष्ट्रीय आइकन और स्थानीय महापुरुषों के नेतृत्व में जन प्रतिरोध का एक सबसे जीवंत केंद्र के रूप में उभरा। 1917 और 1942 के बीच, इस क्षेत्र ने आंदोलनों की एक श्रृंखला देखी जो किसान सत्याग्रहों से लेकर शहरी बहिष्कारों तक, नमक आंदोलन से लेकर व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा तक फैली हुई थी। BPSC ने लगातार इस क्षेत्र से प्रश्न निकाले हैं – दिए गए इनपुट में 13 पिछले वर्ष के प्रश्न (PYQs) सत्याग्रहियों की पहचान, राजस्व बहिष्कार की प्रकृति, अंबाड़ी सत्याग्रह और सराबंदी अभियान जैसे विशिष्ट अभियानों, और स्वामी सहजानंद, राहुल सांकृत्यायन और विनोबा भावे जैसी महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों की भूमिका तक विविध पहलुओं को कवर करते हैं। ये प्रश्न महज़ तुच्छ बातें नहीं हैं; वे स्थानीय घटनाओं को व्यापक राष्ट्रीय आख्यान से जोड़ने, स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न चरणों के बीच अंतर करने और नेतृत्व तथा कालक्रम के सटीक विवरणों को याद रखने की उम्मीदवार की क्षमता का परीक्षण करते हैं।
गंभीर BPSC आकांक्षी के लिए, यह अध्याय आपको निम्नलिखित से लैस करेगा:
- गांधीजी की पद्धतियों को बिहार के कृषि और सामाजिक परिदृश्य में कैसे अनुकूलित किया गया, इसकी वैचारिक समझ।
- बिहार में असहयोग आंदोलन (1920-22) का विस्तृत वर्णन, जिसमें इसके किसान विंग, स्वामी विद्यानंद की भूमिका और चौकीदारी कर के विरुद्ध समानांतर अभियान शामिल हैं।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34) का व्यापक उपचार, जिसमें भागलपुर में नमक सत्याग्रह, चौकीदारी कर का बहिष्कार और 1939 के अंबाड़ी सत्याग्रह पर विशेष जोर है।
- 1940-41 के व्यक्तिगत सत्याग्रह का विश्लेषण, जहां पहले सत्याग्रही (विनोबा भावे) और तीसरे सत्याग्रही (ब्रह्मा दत्त) दोनों बिहार के हैं या बिहार से घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं।
- स्वामी सहजानंद के नेतृत्व में संबंधित किसान आंदोलन, जो सविनय अवज्ञा चरण के समकालीन थे।
- विभिन्न सत्याग्रहों, उनके नेताओं और परिणामों का स्पष्ट वर्गीकरण, अंतिम क्षण की समीक्षा के लिए डिज़ाइन किए गए स्मरणीय उपाय और तुलनात्मक तालिकाओं द्वारा समर्थित।
BPSC ने इस उप-विषय को मध्यम कठिनाई स्तर पर परीक्षण किया है – नाम, तारीख और घटनाओं के तथ्यात्मक स्मरण पर प्रभुत्व है, लेकिन विश्लेषणात्मक प्रश्नों की ओर बढ़ती प्रवृत्ति है जिनके लिए उम्मीदवार को किसी विशिष्ट घटना (जैसे, सराबंदी अभियान) को उसके नेता (सरदार पटेल) से जोड़ने या किसी विशेष विरोध के पीछे का कारण समझने (चौकीदारी कर का विरोध) की आवश्यकता है। इन नोट्स के अंत तक, आप बिहार में असहयोग और सविनय अवज्ञा पर किसी भी BPSC प्रश्न का आत्मविश्वास के साथ सामना करने में सक्षम होंगे।
मूल अवधारणाएं और नींव
विशिष्ट बिहार आख्यान में गोता लगाने से पहले, एक ठोस वैचारिक नींव बनाना आवश्यक है। PYQs में उपयोग की जाने वाली हर शब्दावली – सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, व्यक्तिगत सत्याग्रह, पूर्ण स्वराज, चौकीदारी कर, सराबंदी अभियान, अंबाड़ी सत्याग्रह – को प्रथम सिद्धांतों से समझा जाना चाहिए।
सत्याग्रह: महात्मा गांधी द्वारा अग्रणी किए गए अहिंसक प्रतिरोध की एक दर्शन और प्रथा। यह संस्कृत शब्दों सत्य (सच) और आग्रह (जोर देना या दृढ़ता से पकड़ना) को जोड़ता है। निष्क्रिय प्रतिरोध के विपरीत, सत्याग्रह सक्रिय रूप से आत्म-पीड़ा और नैतिक बल के माध्यम से प्रतिद्वंद्वी को परिवर्तित करने का प्रयास करता है। बिहार के संदर्भ में, सत्याग्रह का उपयोग किसानों, छात्रों और वकीलों द्वारा दमनकारी करों, वन कानूनों और औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध विरोध करने के लिए किया गया था।
असहयोग आंदोलन (1920-1922): रॉलेट अधिनियम और जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद गांधी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा शुरू किया गया पहला राष्ट्रव्यापी जन आंदोलन। इसके कार्यक्रम में उपाधियों का परित्याग, विधान परिषदों, अदालतों और विदेशी माल का बहिष्कार और स्वदेशी का प्रचार शामिल था। बिहार में, आंदोलन को किसान आंदोलन की सक्रिय भागीदारी और स्वामी विद्यानंद, राजेंद्र प्रसाद और श्री कृष्ण सिंह के नेतृत्व के माध्यम से गति मिली।
सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-1934): स्वतंत्रता संघर्ष का एक अधिक आक्रामक चरण, गांधी की डांडी यात्रा (मार्च-अप्रैल 1930) के साथ नमक कानूनों को तोड़ने के लिए शुरू किया गया। आंदोलन में अन्यायपूर्ण कानूनों का जानबूझकर उल्लंघन शामिल था – नमक निर्माण, वन कानून और कर से इनकार। बिहार में, आंदोलन ने भागलपुर जैसे स्थानों पर नमक सत्याग्रह (महादेव लाल सरराफ द्वारा नेतृत्व) और चौकीदारी कर का व्यापक इनकार देखा।
व्यक्तिगत सत्याग्रह (1940-41): द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान गांधी द्वारा युद्ध के खिलाफ अहिंसक विरोध की घोषणा करने के अधिकार की पुष्टि करने के लिए शुरू किया गया। प्रत्येक सत्याग्रही व्यक्तिगत रूप से युद्ध के विरुद्ध अपना विरोध घोषित करेगा। पहले सत्याग्रही विनोबा भावे (बिहार से जुड़े) थे, और तीसरे ब्रह्मा दत्त थे, जो बिहार के एक प्रमुख व्यक्तित्व थे।
पूर्ण स्वराज: संपूर्ण स्वतंत्रता, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा लाहौर सत्र में 19 दिसंबर 1929 को लक्ष्य के रूप में घोषित। तारीख 26-01-1930 को पहले पूर्ण स्वराज दिवस के रूप में मनाया गया (BPSC 2020 में परीक्षित)। यह घोषणा सविनय अवज्ञा आंदोलन के लिए वैचारिक गति प्रदान करती है।
चौकीदारी कर: गांव के रक्षक (चौकीदार) को निधि देने के लिए गांववासियों पर लगाया गया एक स्थानीय कर। बिहार में नमक सत्याग्रह के दौरान, कार्यकर्ताओं ने विरोध के एक समानांतर रूप के रूप में इस कर का भुगतान करने से इनकार करना जोड़ा – BPSC 2018 में परीक्षित। क्योंकि कर को जिला प्रशासन द्वारा एकत्र किया गया था, इसे रोकना औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध एक सीधी चुनौती थी।
सराबंदी अभियान (1922): गुजरात में (विशेष रूप से खेड़ा और बारदोली क्षेत्रों में) सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा नेतृत्व की गई एक गैर-कर अभियान। यह शब्द भूमि और संपत्ति के स्वैच्छिक समर्पण को विरोध के एक रूप के रूप में संदर्भित करता है। BPSC 2019 में परीक्षित, प्रश्न सरदार पटेल को इसके नेता के रूप में सही ढंग से पहचानता है – यह बिहार की घटना नहीं है लेकिन PYQ सूची में प्रकट होती है और बिहार-विशिष्ट आंदोलनों से अलग किया जाना चाहिए।
अंबाड़ी सत्याग्रह (1939): बिहार के अंबाड़ी वन क्षेत्र में (आधुनिक-दिन झारखंड क्षेत्र) राहुल सांकृत्यायन के नेतृत्व में एक सत्याग्रह, एक प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान और बौद्ध भिक्षु। यह सरकार के वन उपज (तेंदु पत्ते, महुआ, आदि) के संग्रह पर प्रतिबंध के खिलाफ एक विरोध था, जिस पर स्थानीय आदिवासी और किसान समुदाय निर्भर थे। BPSC 2019 में परीक्षित।
बिहार में किसान आंदोलन: जमींदारी उत्पीड़न, उच्च लगान और बलपूर्वक श्रम के विरुद्ध कृषि वर्गों का एक निरंतर संघर्ष। स्वामी सहजानंद सरस्वती सबसे प्रमुख नेता थे, जिन्होंने 1929 में बिहार किसान सभा की स्थापना की। उनका आंदोलन असहयोग और सविनय अवज्ञा दोनों आंदोलनों से जुड़ा था। BPSC 2020 में किसान आंदोलन से संबंधित के रूप में परीक्षित।
चौरी घटना (चौरी चौरा घटना 1922 से भ्रमित न हों): BPSC 2021 का प्रश्न बिहार के 1798 के चौरी विद्रोह के बारे में पूछता है। यह चौरी (या चौर) क्षेत्र में ईस्ट इंडिया कंपनी की राजस्व नीतियों के विरुद्ध एक प्रारंभिक जनजातीय/किसान विद्रोह को संदर्भित करता है। यह उत्तर प्रदेश में चौरी चौरा घटना से अलग है। सही तारीख 1798 है, जो बिहार के प्रतिरोध के लंबे इतिहास का प्रमाण है।
इन परिभाषाओं से लैस होकर, हम अब गहन-डुबकी खंड की खोज कर सकते हैं जो आगे आते हैं। नीचे दिए गए विषय कालानुक्रमिक और विषयगत रूप से व्यवस्थित हैं, आधिकारिक पाठ्यक्रम बिंदुओं का संपूर्ण कवरेज सुनिश्चित करते हुए प्रत्येक PYQ तत्व को एकीकृत करते हैं।