परिचय
आधुनिक भारत — ब्रिटिश शासन, सामाजिक-धार्मिक सुधार यह अध्याय BPSC इतिहास प्रश्नपत्र में सबसे अधिक परीक्षित खंडों में से एक है। उपलब्ध पिछले वर्षों के प्रश्नों (125 प्रश्न 2018-2025 तक) से, एक तिहाई से अधिक इस सूक्ष्म विषय की सीधी जांच करते हैं। BPSC परीक्षक का पैटर्न दोहरे जोर को प्रकट करता है: पहला, ब्रिटिश विस्तार और प्रशासनिक समेकन की कालानुक्रमिक-राजनीतिक रूपरेखा (युद्ध, अधिनियम, गवर्नर-जनरल, भूमि राजस्व प्रणाली), और दूसरा, सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन जो उपनिवेशवाद के प्रति प्रतिक्रिया और राष्ट्रवाद की पूर्वधारणा दोनों के रूप में उभरे। एक अलग तीसरा क्षेत्र—बिहार-विशिष्ट सामग्री—लगभग 20% प्रश्नों में दिखाई देता है, जिसमें बिहार प्रांत का गठन (1912), स्थानीय नेता (कुंवर सिंह, सच्चिदानंद सिन्हा, श्री कृष्ण सिन्हा) और क्षेत्रीय आंदोलन (बिहार में नीलहे विद्रोह, बिहार में 1857 का विद्रोह, समाजवादी पार्टी, समाचार पत्र) शामिल हैं। कठिनाई स्तर सीधी तथ्यात्मक स्मृति (तारीखें, संस्थापक, स्थान) से विश्लेषणात्मक मिलान (नेताओं को संगठनों के साथ, अधिनियमों को प्रावधानों के साथ) और मूल्यांकनकारी कथन (उदाहरण के लिए, सुरक्षा-वाल्व सिद्धांत) तक होती है।
इस अध्याय के अंत तक, आप सक्षम होंगे:
- बक्सर के युद्ध (1757) से लेकर भारत शासन अधिनियम 1935 और भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 तक ब्रिटिश शासन के राजनीतिक और आर्थिक समेकन का पता लगाना।
- तीन प्रमुख भूमि राजस्व प्रणालियों (जमींदारी, रैयतवारी, महालवारी) को अलग करना और उन्हें किसान विद्रोहों से जोड़ना।
- प्रमुख सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों (ब्रह्म समाज, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन, सत्यशोधक समाज, आदि) को उनके संस्थापकों, उद्देश्यों और क्षेत्रीय आधारों के साथ मानचित्रित करना।
- हर व्यक्ति, तारीख और घटना की पहचान करना जो BPSC ने बार-बार परीक्षा ली है, जिसमें बिहार-विशिष्ट नेता, सत्र और कानून शामिल हैं।
- सामान्य जालों से बचना जैसे फराइजी आंदोलन के संस्थापक (हाजी शरीयतुल्लाह) को वहाबी आंदोलन के साथ भ्रमित करना, या पहली जनगणना के वर्ष (1872) को दशकीय श्रृंखला से भ्रमित करना जो 1881 में शुरू होती है।
- स्मृति सहायता और पैटर्न-मान्यता तकनीकों को लागू करना क्रमों को याद करने के लिए—उदाहरण के लिए, तीन प्रेसिडेंसी, प्रमुख अधिनियमों को पारित करने वाले वायसराय, या गांधीवादी सत्याग्रहों का कालक्रम।
नीचे की संरचना एक प्रथम-सिद्धांत दृष्टिकोण का अनुसरण करती है: हम पहले मुख्य अवधारणाएं बनाते हैं, फिर विषयगत समूहों में गहराई से जाते हैं, वास्तविक PYQ के माध्यम से काम करते हैं, और अंत में पैटर्न और भविष्यवाणियों को संश्लेषित करते हैं। हर प्रमुख शब्द एक ब्लॉक उद्धरण में परिभाषित है। दो तुलना तालिकाएं और दो स्मृति सहायक प्रतिधारण में सहायता के लिए एम्बेड किए गए हैं।
मुख्य अवधारणाएं और नींव
विशिष्ट घटनाओं के साथ जुड़ने से पहले, आपको मूल शब्दावली को आंतरिक करना चाहिए जो BPSC मानता है कि आप जानते हैं। ये शब्द प्रश्नों में बार-बार आते हैं; उन्हें मूल स्तर पर समझना रोट स्मरण को वैचारिक स्पष्टता में बदल देता है।
उपनिवेशवाद: एक देश द्वारा दूसरे देश का राजनीतिक और आर्थिक प्रभुत्व, जिसमें सीधा प्रशासनिक नियंत्रण शामिल है। भारत में, ब्रिटिश उपनिवेशवाद संपत्ति के ह्रास, औद्योगिकीकरण की कमी, और राजस्व-निष्कर्षक राज्य तंत्र के आरोपण द्वारा चिह्नित था।
धन का ह्रास: दादाभाई नौरोजी द्वारा व्यक्त एक सिद्धांत (BPSC 2018 में उनकी पुस्तक भारत में गरीबी और अनब्रिटिश शासन के लिए परीक्षित) तर्क देता है कि ब्रिटेन ने व्यवस्थित रूप से गृह प्रभार, ब्रिटिश अधिकारियों के वेतन और व्यापार अधिशेष के माध्यम से भारत की संपत्ति को सूखा दिया, जिससे पुरानी गरीबी हुई।
भूमि राजस्व प्रणाली: वह तंत्र जिसके द्वारा ब्रिटिश राज्य कृषि भूमि से कर एकत्र करता था। तीन प्रमुख प्रणालियां मौजूद थीं: जमींदारी (स्थायी निपटान), रैयतवारी (किसान के साथ सीधा निपटान), और महालवारी (गांव-स्तरीय निपटान)। प्रणाली का चयन गहरे सामाजिक और राजनीतिक परिणाम थे।
जमींदारी प्रणाली (स्थायी निपटान): लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा 1793 में बंगाल, बिहार, और बाद में मद्रास प्रेसिडेंसी के हिस्सों में पेश की गई। भूमि राजस्व स्थायी रूप से तय किया गया था। जमींदारों को स्वामी के रूप में मान्यता दी गई थी लेकिन वे अनिवार्य रूप से कर संग्राहक थे। प्रणाली ने एक परजीवी जमींदार वर्ग बनाया और किसानों को कुचल दिया।
रैयतवारी प्रणाली: सर थॉमस मुंरो द्वारा मद्रास प्रेसिडेंसी में (1820) और बाद में बॉम्बे में पेश की गई। सरकार ने रैयत (खेती करने वाले) के साथ सीधे निपटान किया, जिसने मिट्टी की गुणवत्ता और फसल के आधार पर राजस्व का भुगतान किया। रैयत सैद्धांतिक रूप से मालिक था लेकिन उच्च मूल्यांकन और बार-बार संशोधन का सामना करता था।
महालवारी प्रणाली: उत्तर-पश्चिमी प्रांत, पंजाब और होल्ट मैकेंजी द्वारा मध्य भारत के कुछ हिस्सों में पेश की गई (1822) और बाद में परिष्कृत की गई। राजस्व एक महल (गांव की संपत्ति) पर तय किया गया था, गांव की समुदाय संयुक्त रूप से जिम्मेदार था। प्रणाली अक्सर गांव के मुखियों और जमींदारों के बीच अंतर को ढह देती था।
सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन: सामूहिक शब्द 19वीं सदी के आंदोलनों के लिए जो भारतीय समाज को आधुनिक बनाने की मांग करते थे, रूढ़िवादी धार्मिक प्रथाओं (सती, जाति, मूर्तिपूजा) को चुनौती देकर और तर्कवाद, शिक्षा और महिलाओं के अधिकारों को बढ़ावा देकर। ये आंदोलन ईसाई धर्मप्रचार आलोचना के प्रति प्रतिक्रिया और आत्म-सचेत पुनरुत्थान दोनों थे।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC): A.O. ह्यूम द्वारा 1885 में बॉम्बे में पहले सत्र के साथ स्थापित किया गया। सुरक्षा-वाल्व सिद्धांत (BPSC 2023 और 2025 में परीक्षित) मानता है कि ह्यूम ने कांग्रेस को सुरक्षा वाल्व के रूप में बनाया ताकि भारतीय असंतोष को क्रांति से दूर रखा जा सके—एक दावा लाला लाजपत राय और बाल गंगाधर तिलक द्वारा किया गया।
बंगाल का विभाजन (1905): लॉर्ड कर्जन ने 1905 में बंगाल को पूर्वी बंगाल और असम (मुस्लिम-बहुल) और पश्चिम बंगाल (हिंदू-बहुल) में विभाजित किया, कथित तौर पर प्रशासनिक दक्षता के लिए लेकिन व्यापक रूप से एक विभाजन-और-शासन रणनीति के रूप में देखा गया। इसने स्वदेशी आंदोलन को प्रेरित किया।
स्वदेशी आंदोलन: 1905 में बंगाल के विभाजन के विरोध में लॉन्च किया गया, इसमें ब्रिटिश सामानों का बहिष्कार, स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देना और राष्ट्रीय शिक्षा का उपयोग शामिल था। इसने कांग्रेस में चरमपंथी गुट का प्रवेश चिह्नित किया।
गांधीवादी सत्याग्रह: महात्मा गांधी द्वारा विकसित अहिंसक प्रतिरोध का एक दर्शन। BPSC में परीक्षित प्रमुख सत्याग्रह जल्लianवाला बाग के संदर्भ में रॉलट सत्याग्रह (1919, परीक्षित 2018), चंपारण सत्याग्रह (1917), खेड़ा सत्याग्रह (1918), अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918), बारदोली सत्याग्रह (1928, वल्लभभाई पटेल द्वारा संचालित - परीक्षित 2021, 2022), सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930, साबरमती से शुरू - परीक्षित 2019), और भारत छोड़ो (1942)।
साम्प्रदायिक पुरस्कार / पूना समझौता: साम्प्रदायिक पुरस्कार (1932) रैमसे मैकडोनल्ड द्वारा दलितों को अलग निर्वाचिकाओं प्रदान किए गए। गांधी के मृत्यु तक का व्रत पूना समझौते (1932) की ओर ले गया जिसने दलितों के लिए आरक्षित सीटों के साथ संयुक्त निर्वाचिकाओं को प्रतिस्थापित किया।
कैबिनेट मिशन (1946): संवैधानिक ढांचे पर चर्चा के लिए भारत को भेजा गया एक ब्रिटिश मिशन। सदस्य लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस, सर स्टैफोर्ड क्रिप्स और A.V. अलेक्जेंडर थे। रैमसे मैकडोनल्ड सदस्य नहीं थे (परीक्षित BPSC 2021, 2022)। योजना एक कमजोर केंद्र के साथ एक एकीकृत भारत का प्रस्ताव दिया।
आजाद हिंद फौज / भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA): प्रारंभिक रूप से राश बिहारी बोस द्वारा और बाद में सुभाष चंद्र बोस द्वारा संचालित। प्रसिद्ध नारे: "चलो दिल्ली" (परीक्षित 2025), "हम या तो भारत को स्वतंत्र कर देंगे या प्रयास में मर जाएंगे" (परीक्षित 2025)। INA परीक्षण (1945-46) भुलाभाई देसाई द्वारा बचाव किए गए (परीक्षित 2020)। सुभाष चंद्र बोस ने अंडमान और निकोबार द्वीपों का नाम बदलकर शहीद द्वीप और स्वराज द्वीप रखा? (नोट: 2021 और 2022 में परीक्षित; BPSC 2021 के अनुसार सही उत्तर: निकोबार के लिए शहीद द्वीप; 2022 के अनुसार: अंडमान के लिए शहीद द्वीप। वास्तव में 2021 Q25: "सुभाष चंद्र बोस ने निकोबार द्वीप का नाम शहीद द्वीप रखा"। 2022 Q37: "अंडमान द्वीप को दिया गया नया नाम" – उत्तर शहीद द्वीप। असंगति है; मैं ऐतिहासिक रूप से सही सिखाऊंगा: अंडमान = शहीद द्वीप, निकोबार = स्वराज द्वीप। लेकिन BPSC 2021 निकोबार = शहीद द्वीप कहता है; 2022 अंडमान = शहीद द्वीप कहता है। सबसे सुरक्षित दोनों को नोट करना है: सुभाष चंद्र बोस ने अंडमान का नाम शहीद द्वीप और निकोबार का नाम स्वराज द्वीप रखा। हालाँकि, BPSC ने दोनों परीक्षा की है; हम मानक सिखाएंगे: अंडमान = शहीद द्वीप, निकोबार = स्वराज द्वीप। 2021 का प्रश्न त्रुटि हो सकता है। हम त्रुटि को प्रसारित नहीं करेंगे; हम ऐतिहासिक रूप से स्वीकृत सिखाते हैं।)
बिहार एक अलग प्रांत के रूप में: बिहार को 1912 में बंगाल प्रेसिडेंसी से अलग किया गया (कई बार परीक्षित: 2018, 2024)। उड़ीसा 1936 में बिहार से अलग हुआ (परीक्षित 2021, 2022)। बिहार में INC का पहला सत्र पटना में आयोजित किया गया (परीक्षित 2020)।
फराइजी आंदोलन: हाजी शरीयतुल्लाह द्वारा शुरू किया गया (परीक्षित 2018, 2024)। यह बंगाली मुसलमानों के बीच एक धार्मिक और कृषि आंदोलन था जो इस्लामिक कर्तव्यों (फर्ज) पर जोर देता था और दमनकारी जमींदारों का विरोध करता था।
सत्यशोधक समाज: ज्योतिबा फुले द्वारा 1873 में स्थापित (परीक्षित 2018 मिलान, 2019)। इसका उद्देश्य ब्राह्मणीय प्रभुत्व से निचली जातियों को मुक्त करना था।
भारत के सेवक समाज: गोपाल कृष्ण गोखले द्वारा 1905 में स्थापित (परीक्षित 2019, 2023 मिलान)।